"सैना जन्म नहीं लेते हैं ,वह तो अवतार लेते हैं"
सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 में उड़ीसा राज्य के 'कटक' में बंगाल प्रेसिडेंसी के अंतर्गत हुआ ।उस समय भारत में अंग्रेजों का गुलामी ,कुप्रशासन ,कुव्यवस्था कायम था इनकी शिक्षा कैंब्रिज विश्वविद्यालय में संपन्न हुई और वह लंदन में भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास किया लेकिन वह अंग्रेजों के अधीन रहकर काम करना पसंद नहीं किया और वह स्वतंत्रता को लेकर काफी गंभीर था कि भारत में मैं क्या कर सकता हूं मैं भारत को कितना सहयोग दे सकता हूं इन सब वजहों के चलते "ब्रिटिश हुकूमत" के खिलाफ सुभाष चंद्र बोस ने आपने "सिविल सेवा" की नौकरी त्याग कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।
ब्रिटिश सरकार कंपती थी:-
सुभाष चंद्र बोस की राष्ट्रीय भक्ति की आवाज बुलंद और इनकी गतिविधियां और कार्य करने के तरीके से ब्रिटिश सरकार के हाथ पांव कपते थे। सुभाष चंद्र बोस आवाज एक विस्फोटक होती थी और सरकार के काम का सरकारी नीतियों को तहस-नहस कर देती थी इसलिए ब्रिटिश सरकार सुभाष चंद्र बोस से हमेशा सतर्क रहते थे।ब्रिटिश सरकार सुभाष चंद्र बोस को खतरा मानते हुए उनको उनके आवास पर ही नजरबंद कर दिया गया लेकिन सुभाष चंद्र बोस जंजीरों को तोड़ते हुए वह भाग निकले काबुल होते हुए वह जर्मनी और जापान गए । जापान सरकार के सहयोग द्वारा 40000 सैनिकों को एकत्रित करके "आजाद हिंद फौज" या "इंडियन नेशनल आर्मी" की स्थापना की "इंडियन नेशनल आर्मी" की स्थापना में रासबिहारी बोस, कैप्टन मोहन सिंह एवं निरंजन सिंह गिल महत्वपूर्ण भूमिका निभाई INA की पहली सम्मेलन जून 1942 में बैंकॉक में संपन्न हुआ।
सुभाष चंद्र बोस ने 1941 में "INDIAN League"स्थापना की जून 1943 में टोक्यो से घोषणा की- अंग्रेजों से आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वह अपना साम्राज्य छोड़ देंगे हमें भारत के भीतर व बाहर से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने चाहिए अधारताल हमें किसी पर बिना निर्भर रहे देश को आजाद करने की संकल्प हो हमें अपना देश और अपना शासन को संभालना होगा सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर में सेना को संबोधन करते हुए दिल्ली चलो का नारा दिया इंडियन आर्मी कोहिमा ,इंफाल, स्वराजदीप ,शहीद दीप होते हुए पूर्वी भारत पर कब्जा करना चाहा और वहां से फिर दिल्ली की और कुच करके उसे अपने अधीन में कर लेना।
इनके अनुयायियों ने दिया उपनाम:
सुभाष चंद्र बोस के विचारों और राष्ट्रभक्ति की भावना को देकर उनसे बहुत प्रेम करते थे और उनकी एक बातें सुनने के लिए तरसते थे क्योंकि उनकी एक बातों में राष्ट्रभक्ति की भावना भर देते थे और जो व्यक्ति कुछ भी ना कर सके वह भी राष्ट्र की आजादी के
के लिए अपनी जान निछावर करने लगते थ। सुभाष चंद्र
बोस अपने अनुयायियों को "जय हिंद" का अमर नारा दिया
तथा सुभाष चंद्र बोस के अनुसार प्रेम से उनको "नेताजी" कहकर संबोधित करते थे देश की स्वतंत्रता की आजादी में सुभाष चंद्र बोस युद्ध में अंग्रेज के खिलाफ रंगून रेडियो स्टेशन से भारतीय जनता को संबोधन किया इस युद्ध में हमें सहयोग करें और गुलामी की जंजीरों को तोड़ दे इन्हीं संबोधन में सुभाष चंद्र बोस ने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता संबोधन किया और कहा भारत की स्वाधीनता के इस पावन युद्ध में हमें आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएं चाहते हैं।
आजादी को ललकारा :-
बोस ने अपने सैनिकों को ऊर्जा भरते हुए अपने लक्ष्य की प्राप्ति करने के लिए सभी सैनिकों को संबोधन किया और एक नई दिशा राह दिखाएं। 22 सितंबर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुए सुभाष बाबू ने अपने सैनिकों को कहा - तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा यह स्वतंत्रता की देवी की मांग है बिना बलि चढ़ाए देश की स्वतंत्रता मुश्किल है। जब INA आर्मी के सैनिकों पर मुकदमा दिल्ली के लाल किले में चलाया गया तब आम जनमानस ने इनके सहयोग में नारा लगाया लाल किलो को तोड़ दो आजाद हिंद फौज को छोड़ दो ।द्वितीय विश्व युद्ध के क्रम में सुभाष चंद्र बोस को अचानक विदेशी दौरा ताइवान जाना था इसी के क्रम में विमान दुर्घटना हो जाती है और उनकी इस दुर्घटना में मौत हो जाती है सुभाष चंद्र बोस की कर्तव्य उनके कर्मों उनकी ईमानदारी ,देश प्रेमी और उनके पारदर्शिता भारतीय जनता के प्रति सदा बना रहे और वह हमेशा के लिए अजर और अमर हो गए
जय हिंद
Bahut accha
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