कल्हण द्वारा लिखा गया "राजतरंगिणी ग्रंथ" जो विश्व ऐतिहासिक काव्य ग्रंथ है

 कल्हन कश्मीर का राजा जयसिंह द्वितीय के दरबारी कवि था यह एक महान विद्वान के साथ इतिहासकार था इनका जन्म परिहासपुर में हुआ इन्होंने इतिहास को कहानी के रूप में ना लिखकर "काव्य के रूप में विषय वस्तु" बनाया और एक विश्व ऐतिहासिक "राजतरंगिणी ग्रंथ" लिखा। इस ग्रंथ में पहली से लेकर 12 वीं सदी तक इतिहासओं का उल्लेख किया। ग्रंथ में सामाजिक दशा ,आर्थिक ,धार्मिक संस्कृति, दर्शनों के साथ प्रशासन, समाजिक दर्पण ,आम लोगों के जीवन से संबंधित बातें किया।


राजतरंगिणी इसका अर्थ "राजाओं की नदियां" जिसका भावार्थ "राजाओं का इतिहास" होता है इसमें राजाओं के क्रम उनके शासन प्रशासन संबंधित बातें लिखी गई है राजतरंगिणी में की व्याख्या हम विभिन्न बिंदुओं पर कर रहे हैं जो इस प्रकार है-

 निर्माण काल:-

इस ग्रंथ का निर्माण "महाभारत काल" से मानी जाती है इस समय कश्मीर को "कश्यपमेरु" कहा जाता था  इसकी स्थापना पांडवों के छोटे भाई सहदेव ने किया था।

कश्मीर में बौद्ध धर्म:-

 काश्मीर में बौद्ध धर्म 273ई० में आगमन हुआ कुंडलवन में चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन राजा कनिष्क के समय में हुआ और इस समय बहुत बौद्ध धर्म दो भागों में बट गया हीनयान और महायान इस ग्रंथ में इसका उल्लेख किया गया है।

 राजतरंगिणी की संरचना:-

ग्रंथ में कुल 8 अध्याय है और 8000 श्लोकों का संग्रह है। प्रथम 3 अध्याय में कश्मीर की पीढ़ी दर पीढ़ी परंपराएं है और अंतिम दो में कल्हण की व्यक्तिगत जीवन की जानकारी मिलती है।

कल्हण की उद्देशिका :-

इस ग्रंथ में तीन उद्देशिका का उल्लेख है प्रथम में पुराने राजवंशों की जानकारी , दुतीय उद्देशिका में पाठकों का मनोरंजन कराना और अतीत से शिक्षा लेना। नैतिकता इस ग्रंथ में अधिक दिखाया गया है कश्मीर का पहला शासक ज्ञानेंद्र प्रथम बताया गया है जो युधिष्ठिर के समकालीन शासक था।

राजतरंगिणी की विषय वस्तु:-

इस ग्रंथ में शासक विक्रमादित्य का उल्लेख किया गया है कश्मीर के शासकों को "राष्ट्रीय शहंशाह" का विवरण दिया गया है जिसमें कश्मीर के अनेक शासकों की जानकारी इस ग्रंथ में देखने को मिलती है। इसी ग्रंथ में अनेक राजकुमारियों के साथ रानियों का उल्लेख भी मिलता है


 इनके विषय वस्तु तीन प्रकार की है- 

1.राजनीति अर्थ "राजा की नीति" इसमें राजा की नीतियों को तय करता है और निर्णय अंतिम रूप से राजा का ही होता था 

2 भाग में राजा न्याय व्यवस्था और सैनिक विभागों का प्रधान होता था शासक प्रजा द्वारा निर्वाचित होता था यानी एक प्रकार से लोकतांत्रिक प्रणाली का उल्लेख किया गया है जिसमें चारों और जनता के कल्याण शामिल होता था।

3भाग मे राज अधिकारी होते हैं शासक की मृत्यु के बाद जेष्ठ पुत्र राज पद का अधिकारी होता था और अपने पिता के भारतीय जनता को कल्याण करता था। चौथे भाग में राजवंश इसमें लोहार वंश का उल्लेख किया गया है यानी ग्रंथ में "लोहार वंश" की अधिक प्राथमिकता दिया गया है और कल भी एक प्रकार से लोहार जाति से संबंध रखते थे।

प्रशासन शासक को सहयोग करने के लिए सात प्रकार के राज्याधिकारी होते थे जिसमें से इनको संपूर्ण विषयों पर जानकारी देते थे ।सामाजिक स्थिति के रूप में देखें तो इसमें समाज चार वर्णों में विभाजित का उल्लेख किया गया है ब्राह्मण धार्मिक क्रियाओं से जुड़े हुए कार्य करते थे जबकि क्षत्रिय राजा और राज्य सीमा की सुरक्षा की जिम्मेवारी होते थे जबकि वैश्य वर्ग व्यापार से जुड़ा हुआ कार्य करते थे वही शूद्र जो कि सेवा से संबंधित कार्य करता था।

राजतरंगिणी में विधवाओं की स्थिति:-

राजतरंगिणी ग्रंथ में पुनर्विवाह को वर्जित किया गया था इसमें दोबारा विवाह करना खस्त मना था। पति के साथ चीता में जलना या सारा जीवन सादगी जीवन व्यतीत करना होता था इस प्रकार से कहें तो इस समय सती प्रथा का प्रचलन था और यह प्रचलन काफी उत्तम यानी चरम सीमा तक था जो 400 से लेकर 700 तक कुछ सीमा तक पहुंच गई है इस प्रकार से पता चलता है कि समाज में महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं बताई गई और महिलाओं को एक प्रकार से हेह दृष्टि से देखा गया और उनकी सामाजिक हैसियत के रूप से नीचे रखा गया।

राजतिरंगी में धार्मिक स्थिति:-

इस ग्रंथ में शैव ,धर्म बौद्ध ,धर्म वैष्णव धर्म, हिंदू धर्म के साथ साथ कुछ अन्य धर्मों का भी उल्लेख किया गया है। कश्मीर की भूमि पर अनेक धर्मों का समावेश रहा है जो आज के स्थिति की बात करें तो यह काफी संख्या में इस्लामिक भूमि बना है लेकिन हम इस ऐतिहासिक दृष्टिकोण देखें तो विभिन्न धर्मों की विविधता रही है वहां पर किसी कोई खास धर्म का उल्लेख नहीं मिलता है जबकि सभी धर्मों का मिलाजुला असर देखने को मिलता है।

राजतरंगिणी में कृषि व्यवस्था:-

इस ग्रंथ में चावल फसल को प्रमुख खघान्न बताया गया है इस फसल का उपयोग करने से पहले यानी नई फसल होने पर भगवान को अर्पित करके ही ग्रहण करते थे। सातवीं सदी में हवेन सांग का वर्णन "कृषि और फलों" की जानकारी कश्मीर राज्य संबंध मिलती है कश्मीर अंगूर की खेती के लिए तथा से की खेती के लिए काफी मशहूर है यह जानकारी चीनी लेखक के किताबों में भी देखने को मिलती है।

राजतरंगिणी में उद्योग धंधे:-

 इसमें मुख्य व्यवसाय "कृषि"था बहुत से लोग कृषि कार्य यानी प्राथमिक क्षेत्रों में लगे हुए थे इसके अलावा सामाजिक तौर पर अन्य उघोग उपस्थित थे जिसमें चमड़ा उद्योग ,आभूषण उद्योग ,मृदभांड उद्योग। व्यापारी बाहरी क्षेत्र के साथ व्यापार करते थे जिसमें भारतीय व्यापारी एशिया के साथ तिब्बत के साथ चीन के अलावा अन्य देशों के साथ व्यापार करते थे यानी भारतीय व्यापार राष्ट्रीय ना होकर अंतरराष्ट्रीय स्तर था जिससे पता चलता है कि भारत की हैसियत मध्यकालीन में काफी ऊंची है और यह ग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ जिसका विवरण बचा हुआ है जो एकमात्र है।

 निष्कर्ष के तौर पर देखें तो कल्हण द्वारा लिखा गया राजतरंगिणी एक ऐतिहासिक विवरण मिलता है यह ग्रंथ एक प्रकार से कहानी ना होकर काव्य के रूप में लिखा गया जो एकमात्र ऐसी ग्रंथ है जो दुनिया की ऐतिहासिक ग्रंथ है जो इतिहास में भूमिका रखता है।भारतीय समाज में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक ,धार्मिक, प्रशासनिक ,मानव जीवन, वर्णों के साथ सामाजिक रूप में महिलाओं की स्थिति भारतीय शासक राष्ट्रीय शासक के साथ एक प्रकार से विदेशी शासक के ऊपर प्रभावशाली संबंध व्यवस्था कायम करते और वह अपने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करवाते थे। भारत की प्रसिद्धि कल्हन के माध्यम से इतिहास का संदेश देता है। भारतीय शासक राष्ट्रीय शासक के साथ वह एक प्रकार से अंतरराष्ट्रीय शासकों के साथ काफी तालमेल के साथ ऊंचे रखती है। भारतीय सामाजिक तौर तरीके के साथ हमें राजाओं के शासन और प्रशासन की जानकारी हमें स्पष्ट रूप से और ऐतिहासिक प्रमाण के साथ मिलती है जैसे देशों में महान शक्तिशाली राजाओं का शासन रहा।

जय हिंद 














KRISHNA KUMAR

Self employed,IAS preparation and State level services prepration.

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने