"उद्योग क्षेत्र ही बेरोजगारों को पचा सकती है।"
आजादी के समय भारतीय उद्योग क्षेत्र:-
लूटा - लूटा भारतीय संसाधनों को इस प्रकार से लूटा आजादी तक हम लुटाते रहे अंग्रेजों के हाथों। स्वतंत्रता के समय भारत का कोई खास विकास नहीं हो पाया था क्योंकि भारत में अंग्रेजी शासन की समाप्ति के बाद भारतीय उद्योग को कंगाल कर के रख दिया था। भारतीय उद्योग को केवल माल उत्पादक बना के रख दिया गया था और सारा का सारा वस्तुएं इंग्लैंड भेजा जाता था और वहां से फिर तैयार वस्तुएं भारत में बेचे जाती थी एक प्रकार से पूरे भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट नारायण कर दिया। जो आज तक हम बड़ी मात्रा में इसका विकास नहीं कर पाए हैं। आजादी के समय भारत में कुछ छोटे-मोटे उद्योग ही सीमित दायरे में फैले हुए थे जैसे कपड़ा उद्योग, जूट उद्योग और जमशेदपुर और कोलकाता में लोहा और इस्पात उद्योग ही कायम थी लेकिन भारत सरकार के आने के बाद भारत में कई परिवर्तन देखने को मिली।
औद्योगिक क्षेत्र का प्रभाव:-
औद्योगिक वह क्षेत्र होता है इसमें कच्चे वस्तुओं का प्रयोग करके एक तैयार वस्तुएं मनाई जाती है और अंतिम रूप से इसे बाजार में उपलब्ध कराई जाती है। जहां पर वस्तुएं बनती है उसे द्वितीय क्षेत्र कहा जाता है और इसे ही विनिर्माण क्षेत्र कहा जाता है। विनिर्माण क्षेत्र में हमें भारी मात्रा में निवेश करने पड़ते और बहुत बड़ी मात्रा में रोजगार भी उपलब्ध कराती है। उद्योग रोजगार के मामले में स्थाई होती है और लंबे समय तक रोजगार को उपलब्ध कराती है इस प्रकार से भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसकी प्रभाव बेहद हो जाती है और लोगों की आर्थिक आमदनी बढ़ाने भी बड़ी काम करती है। आजादी के बाद भारत में वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाने के लिए भारत सरकार ही अपने पास उद्योग को रखा क्योंकि आजादी के बाद भारत में उद्योग में निवेश करने के लिए लोगों को पास पूंजी नहीं था तो भारत सरकार को ही भारत में उद्योग विकास करने की जिम्मेदारी उठाने पड़े और भारत सरकार बड़े-बड़े उद्योगों को स्थापित किया। पहली से सातवीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत भारत में भारी उद्योग स्थापना किया गया और भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग कारखाना खोला गया और वृहद पैमाने पर लोगों को रोजगार देने का कार्य किया गया।
उद्योग को सरकार अपने अधीन रखने कारण :
जब भारत देश आजाद हुआ उसमें उद्योग में निवेश करने के लिए पूंजी नहीं थी निवेश वह होता है जिसमें उत्पादन कार्य को बढ़ाने के लिए किया गया खर्च करना ताकि उत्पादन अधिक मात्रा में किया जाए और उसकी आपूर्ति भी सही ढंग से किया जाए तो ऐसी परिस्थिति में भारत सरकार ने उद्योग को अपने हाथों में लिया और उद्योग को आगे बढ़ाया सरकार ने भारतीय उद्योग को इस प्रकार से व्यवस्थित किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था समाजवाद की ओर जाएगी जिसमें भारतीय लोगों की कल्याण निहित होगा समाजवादी अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप देने के लिए भारत सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से लगातार भारी उद्योग स्थापित करने का कार्य किया जिसमें भारी उद्योग के मध्यम उद्योग से स्थापित करने का पूरा का पूरा जिम्मेवारी सरकार के पास रह गया और इनका नियंत्रण करना भी सरकार के हाथों में रह गया। कुछ मामलों के निजी क्षेत्रों की अधिकार था लेकिन वह अनुपूरक होती थी और सबसे अधिक भूमिका समाज ने निजी क्षेत्र की होती थी यही वजह है कि अधिकांश उद्योग सरकार के हाथों में रखना पड़ा ऐसा नहीं है 1991 में नई नीति के तहत भारत सरकार ने अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से खोल दिया यानी खुले द्वार की नीति लागू कर दिया गया और इसका प्रभाव भारत में एक बड़े पैमाने पर हुआ और भारी भारी उद्योग निरीक्षक के रूप में उभरे । सुझाव दिया कि वह क्षेत्रों से सरकार को हटा जाना चाहिए यानी कि उसका नियमन प्रबंधन और नियंत्रण निजी हाथों में रहने दे बाकी सरकार अलग और बड़े क्षेत्रों में कार्य करें यही वजह है कि भारत आज उत्पादन का हब के रूप में बना हुआ है जिसका कारक नरसिम्हा और राव नीति ही प प्रभावशाली माना गया।
देश की औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956:-
इस नीति में भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए भारी उद्योग पर ध्यान दिया गया। यह 1956 में अंगीकार किया गया और इसे सही रूप देने के लिए द्वितीय पंचवर्षीय योजना में जगह दिया गया दि्तीय पंचवर्षीय योजना में ही समाज के समाजवादी स्वरूप को तैयार करने का प्रयास किया गया इस नीति में भारतीय उद्योगों 3 वर्ग विभाजित किया गया जिसमें पहले भाग में सरकार का स्वामी था यह वैसा क्षेत्र था जो सार्वजनिक क्षेत्र था और पूरी तरह से भारत सरकार का अधीन में था इस पर उत्पादन वितरण प्रबंधन और देखरेख सरकार के अंतर्गत संचालित होती थी । जबकि वहीं दूसरे वर्ग में निजी क्षेत्र की कंपनियां शामिल थी जिसकी स्थापना किया जाता था लेकिन इसकी लाइसेंस की अनुमति सरकार के पास ही होती थी जब का लाइसेंस की अनुमति नहीं देगी तब तक कोई भी उद्योग स्थापित नहीं कर पाता था। जबकि तीसरे वर्ग में उद्योग शामिल मे दोनों मिलकर अर्थव्यवस्था गति देने के लिए कदम बढ़ाया लेकिन यह क्षेत्र भी सरकार के अधीन में ही रखा गया यानी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को निजी हाथों में खुद अपने हाथों में रखा क्योंकि हम सभी को पता है कि भारत में एक EIC कंपनी किस प्रकार से गुलाम बनाया इसी वजह से भारत सरकार ने शुरुआती दौर में लगभग 60 वर्षों तक भारतीय अर्थव्यवस्था गति देने के लिए अपने हाथों में उद्योग को रखा और अपने हिसाब से घोड़ा के रथ को चाबुक के आधार पर घुमाया।उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कई प्रकार के लाइसेंस से प्राप्त करनी होती है वैसे प्राप्त करने के बाद ही हमें वस्तुओं को उत्पादित करने का मौका मिलता है और सही रूप से उसके उत्पादन किया संपन्न हो पाती है लाइसेंस तभी दिया जाता है जो सरकार को लगता है और आश्वस्त हो जाता है कि अर्थव्यवस्था में बड़ी मात्रा में वस्तुओं की आवश्यकता है तब सरकार आपने मंजूरी प्रदान करती है ताकि लोगों की खाद और आपूर्ति ,मांग और आपूर्ति बना रहे और भारतीय अर्थव्यवस्था संतुलन में कायम रहे।
लघु उद्योग 1955 में लागू :-
1955 में ग्राम तथा लघु उद्योग समिति के आधार पर लघु उद्योग को लागू किया गया और इसे कार्वे समिति भी कहा गया यह उद्योग एक प्रकार से ग्रामीण विकास को प्रोत्साहन करना था और लघु उद्योग पर बल देना था लघु उद्योग की परिभाषा समय समय में बदलती रहती है 1950 में लघु उद्योग हुआ था जिसमें निवेश की अधिकतम सीमा ₹500000 तक थी लेकिन वर्तमान समय में इसकी अवधि 1 करोड से अधिक से अधिक निवेश क्षेत्र में कर सकते हैं । सिद्धांत को पालन करने के लिए सरकार ने लघु उद्योग के प्रस्ताव को प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया कि भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना बहुत जरूरी है क्योंकि देश के अधिकांश भाग गांवों में बसती है और उनकी गतिविधियां का मुख्य स्रोत कृषि क्षेत्र है क्षेत्र के अलावा व्यवस्था करते हैं पशु पालन अन्य उद्योग को बढ़ावा देते हैं तो भारत की अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से आगे बढ़ेगी छोटे-छोटे, बड़े-बड़े होने लगेंगे और इसे जब हम बाजार में बेचेंगे या इसे हम विदेशों में भी बेच पाएंगे और काम करने के लिए बड़ी मात्रा में रोजगार की आवश्यकता होती है और रोजगार को अच्छी खासी यहां काम करने को मिल जाती है लेकिन दु:ख की बात यह है कि छोटे उद्योग बड़े उद्योगपतियों की प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते हैं लेकिन सरकार ने कम उत्पाद शुल्क, कम बैंक ब्याज दरों पर इसे संरक्षित और मजबूत करने का कार्य किया जिसके चलते भारत के उद्योग कायम है और अपने परिवार के साथ देश की प्रगति में बने हुए हैं।
परमिट कोटा का लाइसेंस क्या था:-
भारत में बड़े उद्योगपति छोटे उद्योगपतियों को आगे बढ़ने नहीं दे रहा था क्योंकि हर कोई नहीं चाहता है कि शक्ति मेरे हाथों से दुसरे हाथ में रहे और शक्ति का बंटवारा ना हो भारतीय उद्योग में छोटे व्यापारियों छोटे उद्योगों को बढ़ने के लिए अक्सर समस्या का सामना करना पड़ रहा था क्योंकि बड़े उद्योग अक्सर उत्पादन करने के लिए सरकार से लाइसेंस ले लेते थे और इस वस्तुओं का उत्पादन बाजार में नहीं करते थे और बाजार में एक तरह से एकाधिकार बना के रखा था एकाधिकार बाजार वह बाजार होती है जिसमें उत्पादन वितरण पर एक कंपनी या एक ही फार्म या एक ही व्यक्ति का अधिकार हो इस नियम से भारत सरकार को परेशानी उठाना पड़ा और जल्द ही ऐसे उद्योगपतियों के लाइसेंस रद्द कर दिया गया और भारतीय अर्थव्यवस्था को सभी के लिए खोल दिया गया भारत सरकार के सहयोग से देश के कानों -कोने में नई आर्थिक नीति के तहत भारतीय अर्थव्यवस्था को खोल दिया जिसे खुले द्वार की नीति कहा गया अब कोई भी व्यक्ति भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश कर सकते हैं ।भारतीयों के लिए भी और विदेशों के लिए भी निवेश की सीमा तय कर दी गई। एक निश्चित निवेश के तहत भारतीय उद्योग को आगे बढ़ाया जाएगा जैसे कि 1990 मे किसी व्यक्ति को मोबाइल लेना है तो मुश्किल उठानी पड़ती थी । भारत सरकार को निजी हाथों के माध्यम से व्यापक रूप से पूरे बाजार में बाजार को फैलाया और सभी लोगों को सुविधा देने का कार्य किया लेकिन कभी-कभी घातक सिद्ध हो जाती है अधिक दरों वसूलने लगते हैं आम जनों की समस्या होने लगी जो वर्तमान समय में देखा जाता है कंपनीय भारी भरकम दामों में बेच रही है ।सरकार इस पुनः निरीक्षण करने चाहिए और जितना हो सके शुरुआती के समय भारत के समाज ही समाजवादी अर्थव्यवस्था जिसमें कल्याण निहित हो उसी का आधार पर कार्य करें यदि ऐसे कार्य निजी कंपनियां नहीं करती है तो उसकी लाइसेंस तुरंत रद्द कर दें।
प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में भारत की तरक्की बहुत अधिक हुई और औद्योगिक क्षेत्रों की अच्छा खासा विकास किया जिसमें जीडीपी का अनुपात 1950-51 में 11.8% से बढ़कर 1990-91 में 24.6% बढ़ गया जबकि वर्तमान समय में भी अच्छी खासी इसकी प्रगति है इसके अलावा भारत के हर क्षेत्र में चाहे टेलीकॉम क्षेत्र , सेवा क्षेत्र , कृषि क्षेत्र, विनिर्माण क्षेत्र में प्रगति मिली है यह परिणाम है उद्योग को बढ़ावा देना आवश्यक है बेरोजगार को खत्म करती है और अर्थव्यवस्था को मजबूत करती है। सरकार अधिक मात्र में उद्योग को निजी हाथों में न बेचें क्योंकि निजी क्षेत्र हर समय अच्छा काम नहीं कर पाते हैं और वह अपने लालच के बस में परमिट लाइसेंस जारी कर लेती हैं जिसमें भारतीय आम जनों को परेशानी उठाना पड़ता है और अधिक खर्च करनी पड़ती है क्योंकि सभी को पता है कि भारत में आर्थिक क्षमता लोगों के पास कम है। भारत सरकार निजी - सार्वजनिक के माध्यम से ही वस्तुओं को पहुंचाने का काम करें।भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारतीय समाजवाद के साथ-साथ लोगों का कल्याण देश का कल्याण निहित हो।
जय हिंद
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ज्ञान प्राप्ति ही मोक्ष की प्राप्ति है
धन्यवाद