"जब सरकार से जनता की मांग पूरी ना हो तो लोग उतर आते हैं सड़क पर"
खिलाफत आंदोलन एक साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन था यह दोनों आंदोलन अंग्रेजी सरकार के खिलाफ चलाया गया था। आंदोलन भारतीय राष्ट्रवाद से जुड़ा हुआ था ये आंदोलन भारतीय आधुनिक इतिहास में एक मील का पत्थर है और इतिहास के पन्नों में मिशन मोड की तरह है खिलाफत आंदोलन यानी किसी के प्रति खिलाफ हो जाना जिस प्रकार से भारतीय इस्लामिक संप्रदाय के लोगों ने तुर्की की खालिफा बचाव के लिए अंग्रेजी सरकार के खिलाफ हो गए और जनसमर्थन के माध्यम से जन आंदोलन को जन्म दिया।
खिलाफत आंदोलन क्या था:-
इस आंदोलन का संबंध इस्लामिक दुनिया से जुड़ा हुआ था जब तुर्की खलीफा मुस्थापा कमाल जब वह राजा था तुर्की में तब इन पर अंग्रेजी शासन की नीतियां और खलीफा की पद समाप्त अंग्रेज सरकार द्वारा जाने का डर था इसी के एवज में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत किया गया आपको बता दें इस आंदोलन की शुरुआत तुर्की में ना होकर भारतीय जमीन पर किया गया एक तरह से कहें तो भारतीय जमीन से हम विदेशी जमीन की ओर चले गए इस्लामिक दुनिया को बचाने के लिए।
खिलाफत आंदोलन से जुड़े हुए व्यक्ति :-
यह आंदोलन भारत में मोहम्मद अली और शौकत अली एवं अली बंधुओं ,अखिल भारतीय मुस्लिम एकता लामबंदी तथा गोलबंद से जुड़ी हुई है इन सभी लोगों ने भारत से खलीफा का पद बचाने के लिए तथा इस्लामिक दुनिया का अस्तित्व बनाए रखने के लिए अंग्रेजी सरकार के खिलाफ और विरोध प्रदर्शन करने लगे क्योंकि इस समय भारत में अंग्रेजी शासन का हुक्म था यदि हम भारत से तुर्की खलीफा का समर्थन भारत से करेंगे तो अंग्रेजी सरकार पर दबाव बढ़ेगा और खलीफा का पद को बरकरार रखेगा ।
आंदोलन शुरुआत के लिए बनाई गई कमेटी:-
आंदोलन की शुरुआत करता में 20 मार्च 1919 में खिलाफत आंदोलन की कमेटी 24 नवंबर 1919 को दिल्ली में अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन का आयोजन आयोजन हुआ और 17 अक्टूबर 1919 को "खिलाफत दिवस घोषित" किया गया इस दिन तय किया गया कि अंग्रेजी सरकार पर हम दबाव उनके खिलाफ बनाए रहेंगे ताकि खलीफा का पद बना रहे ।
खिलाफत आंदोलन शुरुआत की मंजूरी:-
मुंबई में अधिवेशन खिलाफत आंदोलन की अनुमति की आगाज कर दी गई और इस समय भारतीय कांग्रेस पार्टी द्वारा भारत में आंदोलन चलाने के लिए अंग्रेजों को भारत से हटाने के लिए निकालने के लिए असहयोग आंदोलन चलाने की कार्य कर रही थी दोनों आंदोलन का उचित समय देखते महात्मा गांधी ने एक साथ कर दिया और खिलाफत आंदोलन असहयोग आंदोलन में विलीन हो गया क्योंकि खिलाफत आंदोलन के मुस्लिम संप्रदाय के लोग अकेले पूरे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन नहीं चला सकते थे क्योंकि इनके पास इतनी बड़ी मात्रा में जन समर्थन नहीं हो पाती और बिना कांग्रेस के कोई भी आंदोलन सफल नहीं हो पाती क्योंकि उस समय कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी में से एक थी उनकी हर एक इशारे पर पूरे भारत पर एक प्रकार से कहे तो इशारे पर कार्य हो जाती थी क्योंकि कांग्रेस के पास जनसमर्थन कायम था इस प्रकार से देखें तो खिलाफत आंदोलन के कार्यकर्ताओं में से प्रमुख मोहम्मद अली शौकत अली ने अपने आंदोलन की मोड असहयोग आंदोलन के साथ जोड़ दिया आपने संप्रदाय के लोगों को भी इस आंदोलन में शामिल कर दिया और तरीके से आंदोलन शुरू किया गया।
खिलाफत आंदोलन के कारण:-
प्रथम विश्व की शुरुआत होने से 1914 से 1918 के बीच हुई इसमें तुर्की की हार से मित्रराष्ट्रों की तरफ से कठोर प्रतिबंध लगाने का कार्य किया जाना था और खालिफा की पद को समाप्त करने की योजना थी। इस्लामिक दुनिया पर खतरा महसूस किया जाने लगा जिससे जन आंदोलन की शुरुआत की ताकि इस्लामी पद्धति कायम रहे एक प्रकार से कहे तो प्रथम विश्व युद्ध में जब मित्रों की जीत हुई थी जो हारे हुए थे उस पर कड़े प्रतिबंध लगाया जाना था जिसमें से तुर्की के खलीफा की पद को समाप्त करना था और मुस्लिम संप्रदाय में खालीफा इस्लाम का कर्ताधर्ता व्यक्ति होता है एक प्रकार से धार्मिक व्यक्ति के साथ-साथ और राजनीतिक नेता भी होता है उन्हीं के इशारे पर पूरे इस्लाम प्रति कायम रहती है
खिलाफत आंदोलन के नेतृत्व कर की धाराएं क्या रही:-
खिलाफत आंदोलन के कई चरणों में गुजरी जिसमें सामाजिक तौर पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने चढ़कर हिस्सा लिया हम इस में बात करेंगे खिलाफत आंदोलन के समय चलाए गए स्तर यानी कि योजनाबद्ध तरीके से चलाए जाने के बारे में जिनकी व्याख्या इस प्रकार से है -
a.अलीगढ़ से शिक्षित वर्ग:-
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़े हुए प्रशिक्षित और विद्वान व्यक्ति तथा बुद्धिमान लोग जुड़े हुए थे यह लोग अंग्रेजी को भारतीय मुस्लिमों को तुष्टीकरण करने की नीति का आरोप लगाया था मुस्लिम लोगों को सरकारी नौकरियों में नहीं रखा गया था इन लोगों ने मुस्लिम वर्ग को सरकारी नौकरी में रखने की जगह पर दबाव बनाया तथा आर्थिक क्षमता की बराबरी और उन्नति के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया इन लोगों की कार्य योजना से ब्रिटिश सरकार पर काफी दबाव बढ़ा और विश्वविद्यालय से जुड़े हुए प्रशिक्षित लोगों ने इनकी भूमिका बखूबी से निभाया और अंग्रेजी सरकार को पानी पानी होने के लिए मजबूर कर दिए।
b. उलेमाओं की भूमिका:-
इस वर्ग में वैसे लोग शामिल थे जो इस्लाम पद्धति को शिक्षा के माध्यम से जीवित रखे हुए थे और यह लोग मदरसा में शिक्षा देने का कार्य करते थे साथ ही साथ फैसला सुनाने का भी कार्य करते थे। उलेमाओं ने भारत में पश्चिमी शिक्षाओं का व्यापक रूप से विरोध किया तथा इस्लामिक शिक्षा को मजबूत करने की पेशकश की और कहा हमारे देश में जो पश्चिमी शिक्षा है हमारी सभ्यता संस्कृति को विनाश कर देगी इसलिए में अंग्रेजी शिक्षा का विरोध करता हूं और अपनी इस्लामिक शिक्षा को मजबूत करने की आह्वान करता हूं अपने आप में एक प्रकार से कहे तो जुनून भर दी। दूसरे वर्ग के रूप में उभरी जो शिक्षित वर्गों ने पश्चिमी शिक्षा की वकालत की शिक्षा के संतुलन पर बल दिया जबकि उलेमाओं ने कट्टरपंथी रूप को जन्म दिया तो दूसरे स्तर में खिलाफत आंदोलन की बात करें तो 2 वर्ग पर विशेष रहा एक वैसे लोग जो अंग्रेजी शिक्षा पर संतुष्ट थे। दुनिया में अपनी तुलना प्रतिस्पर्धा करने के लिए शिक्षा जरूरी था जबकि उलेमाओं ने सिर्फ इस्लामिक को जिंदा रखने के लिए इनकी शिक्षा को कायम करने के लिए आंदोलन किए।
खिलाफत आंदोलन का प्रभाव क्या रहा:-
इस आंदोलन का निम्नलिखित प्रभाव पड़े जिसके बारे में हम बात कर रहे हैं। इस्लाम के तहत तुर्की सत्ता के पास एक धार्मिक केंद्र का समावेश हो क्या पूरी दुनिया को तुर्की और ध्यान केंद्रित कर दिया जिसमें खलीफा का पद मिलना चाहिए और एक व्यापक अपने देश और दुनिया से जनसमर्थन प्राप्त हो गया । मुस्लिम पवित्र स्थान की सुरक्षा की वकालत की और इस्लाम को अपने आप में जीवित रखने के लिए आंदोलन में अभिजात के अलावा शहरी व ग्रामीण उलेमाओं तथा धार्मिक अध्ययनों के बीच खेला और इन लोगों ने बखूबी रूप से एक जन समर्थन तैयार किया ताकि खलीफा की पद बचा रहे खिलाफत में हजारों लोग शामिल हुए तथा लाखों लोग शत्रु के सरे जमीन की ओर से चले गए यानी कि भारत से होकर तुर्की और चले गए यह व्यापक रूप से देखा गया कि खलीफा का पद बचाने के लिए भारत देश से तुर्क देश की ओर शामिल हो गया क्योंकि दोनों जगह एक ही सरकार थे। खिलाफत से अखिल भारतीय निकायों में एक बड़ा बदलाव लाया जन्म दिया इस आंदोलन के प्रभाव में ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी का गठन हुआ इसके अलावा जमीयत उलेमा ए हिंद की स्थापना हुई दोनों के माध्यम से भारतीय मुसलमानों को लामबंदी एवं गोलबंदी करने का कार्य किया गया और विरोधी अभियान तेज कर दिया गया एवं गैर भारतीय मुस्लिमों को एक करने का काम किया।
खिलाफत आंदोलन ब्रिटिश सरकार का खिलाफ एवं उनके साम्राज्यवाद नीति के चलते चलाया गया इस्लाम की दुनिया में खलीफा का पद बनाए रखने के लिए एक व्यापक समर्थन मिला। भारत की ओर से तुर्की की सत्ता में स्थित मुस्तफा कमाल पाशा को दिया गया। अंग्रेजी सरकार को दबाव डाला गया। मुस्लिम संप्रदाय के लोगों के साथ-साथ अलीगढ़ विश्वविद्यालय उलेमाओं शिक्षित वर्गों ने समर्थन किया। दुनिया में इस्लाम की शिक्षा को भी आगे बढ़ाया। खिलाफत आंदोलन देशभक्ति की जुनून शक्ति और जज्बा भारतीय इतिहास के लिए एक मील का पत्थर है क्योंकि इस समय अंग्रेजों को खिलाफ हर कोई लड़ रहा था तो भारत में भी एक खिलाफत आंदोलन की शुरुआत किया गया जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद को रोकना था। उनकी निरंकुश नीतियों को रोकना था और साथ ही साथ भारतीय राष्ट्र को स्वतंत्रता की प्राप्ति भी करनी थी लेकिन बाद में यह आंदोलन असहयोग आंदोलन के साथ है समावेश हो गया लेकिन शामिल होने से पहले एक व्यापक माहौल खड़ा किया। अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध में व्यापक आंदोलन रहा ताकि वह अपनी हरकतों से बाहर न जाए और न तुष्टिकरण का कार्य करे सही रूप में कल्याण का कार्य करनी चाहिए।
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"मुक्ति का मार्ग ज्ञान की प्राप्ति है"
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जय हिंद