"गांधी की सभी आंदोलन "अहिंसा परमो धर्मा" पर आधारित है"
असहयोग आंदोलन का परिचय:-
महात्मा गांधी द्वारा चला गया यह प्रथम जन आंदोलन था इसके पहले महात्मा गांधी ने अन्य आंदोलन को सफलतापूर्वक से चला चुके थे जैसे कि चंपारण सत्याग्रह आंदोलन प्रमुख रूप से महात्मा गांधी को भारत में नायक रूप में स्थापित कर दिया असहयोग आंदोलन पहली बार 2 जून 1920 को इलाहाबाद में विचार विमर्श किया गया और सितंबर 1920 में कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन में इस प्रस्ताव को पारित कर दिया गया जबकि दिसंबर 1920 में नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन को बिना विरोध के साथ लागू कर दिया गया और इस प्रकार से भारत में अंग्रेजों के प्रति असहयोग आंदोलन का अभियान छेड़ दिया गया जिसमें किसी भी प्रकार से अंग्रेजी सरकार को सहयोग नहीं करना था।
असहयोग आंदोलन का अर्थ :-
इसका अर्थ यह है कि 1920 के समय में भारत में अंग्रेजी हुक्म की सरकार थी और वह अपने अनुसार से भारतीय विभागों पर अपने तरीके से सरकार चला रहा था जिसमें अंग्रेज की नीतियों में सिर्फ ब्रिटेन के लाभ पर आधारित थी जबकि वहीं पर भारतीयों के लिए किसी भी प्रकार से सहायता और कल्याण पर आधारित नहीं था इसी के चलते भारत में 1920 के दौरान आंदोलन का सीधा अर्थ है कि अंग्रेज सरकार को सहयोग नहीं करना इसका भावार्थ है कि भारत में अंग्रेजी शासन जो कायम थी वह भारतीयों के बुनियादी पर ही कायम था भारतीय लोग ही अंग्रेजी सरकार को सहयोग करते थे प्रशासनिक क्षेत्रों में सैनिक क्षेत्रों में व्यापार के क्षेत्रों में इन सभी क्षेत्रों के माध्यम से सरकार अधिक मात्रा में राजस्व की अदा ब्रिटेन सरकार और इस कंपनी को तथा अपने कर्मचारियों को करता था लेकिन इसका भारतीयों को लाभ बिल्कुल नहीं मिल पाता था।
असहयोग आंदोलन के कारण:-
a. बिना कारण के कोई भी आंदोलन नहीं चलाया जा सकता है यदि कारण और वजह मजबूत है तो आंदोलन की जड़ और अधिक मजबूत होगी आंदोलन के कारणों को पीछे के घटी घटनाओं को हम देख सकते हैं लेकिन सबसे प्रमुख रूप से काला कानून को देखा जा सकता है।कल कानून को "रौलट एक्ट" कहा जाता है यह अधिनियम 1919 में पारित कर दिया गया था इस अधिनियम में यह उल्लेख था कि भारतीयों को बिना ट्रायल किए बिना वकील ,अपील और दलील के बिना सीधे कार्रवाई का प्रावधान था और उसे 2 या 3 सालों तक जेल में रखा जाना था। काला कानून का सीधा मतलब था कि भारत में बढ़ते राष्ट्रवाद की धारा को खत्म या कम करना ताकि लोग देश की आजादी में मुख्य भूमिका निभाने वाले लोगों को गिरफ्तार करके जेल में रखा जाए और क्रांतिकारी गतिविधियों को प्रतिबंध और उसे समाप्त कर दिया जाए।
b. दूसरे कारणों को तत्कालिक और ज्वलनशील मुद्दा को देखें तो 13 अप्रैल 1919 को जालियांवाला बाग हत्याकांड को दिखा गया यह घटना पंजाब के अमृतसर में वैशाखी पर्व के दौरान घटी क्योंकि पंजाब के दो प्रमुख नेता डॉ सत्यपाल किचलू और सैफुद्दीन किचलू को ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार करके जेल में रखा गया था यह दोनों बहुत बड़े नेता थे और इनकी रिहाई के लिए सभी लोग वैशाखी पर्व के दौरान अमृतसर के जलियांवाला बाग मैदान में बैठे हुए थे और विचार विमर्श कर रहे थे जबकि वहीं दूसरी और मार्शल लो अधिनियम लागू था इसमें यह कहा गया था कि बिना ब्रिटिश सरकार की अनुमति के बिना कोई भी व्यक्ति एक जगह बैठ नहीं सकता है, विचार नहीं कर सकता है, सम्मेलन नहीं कर सकता है और अधिक से अधिक लोग जमा नहीं हो सकते हैं इन वजहों के चलते अंग्रेजी गवर्नर जनरल डायर ने अचानक बैठे सभी लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया जिसमें हजारों भारतीयों की जान मौके पर चली गई यह घटना भारतीयों के लिए आहत पहुंचाया और इसी घटना के दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सर की उपाधि अंग्रेजी सरकार को लौटा दी थी।
आंदोलन का नेतृत्वकर्ता:-
इस समय भारत की जमीन से दो आंदोलन ब्रिटिश सरकार के प्रति उभर रही थी जिसमें एक खिलाफत आंदोलन और दूसरा असहयोग आंदोलन गांधीजी उचित समय का मौका देखते हुए असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन को एक साथ कर दिया तथा खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन में शामिल करके गांधी जी दोनों आंदोलन का नेतृत्व करता बन गया गांधी जी के पास आंदोलन चलाने का एक अच्छा अनुभव था इसके पहले चंपारण सत्याग्रह आंदोलन खेड़ा सत्याग्रह आंदोलन अमदाबाद आंदोलन का सफल कर चुके थे इसमें महान नेता बाल गंगाधर तिलक की स्वास्थ्य खराब चल रहे थे गांधीजी उपयुक्त समय का प्रयोग किया आंदोलन की बागडोर संभाल ले अपने आंदोलन की रूपरेखा तय कर दी।
असहयोग आंदोलन की कार्यक्रम :-
कार्यक्रम में निम्नलिखित लक्ष्य को शामिल किया गया जिसमें कहा गया सरकारी उपाधियों का त्याग करें क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने रायबहादुर , दीवान बहादुर जैसी उपाधियों का प्रचलन किया था। वहीं दूसरी लक्षय सेना , पुलिस सहित सभी प्रकार की सरकारी नौकरियों की इस्तीफा देना था सरकार को कर ना भुगतान करना भी शामिल था। इस वजह से कर ना दो आंदोलन भी गांधी जी द्वारा चलाया लिया। शुरुआती के दौर में कांग्रेसी नेता और पार्टियां इस आंदोलन को चलाने के लिए जा रहे थे क्योंकि इस आंदोलन में धार्मिक लक्षण को समावेश होने की संभावना होने लगी थी क्योंकि खिलाफत आंदोलन तुर्की खलीफा के लिए जब असहयोग आंदोलन एंग्री सरकार को सहयोग ना करने के लिए चला गया लेकिन आगे चलकर दोनों आंदोलन ने एकता का परिचय दिया और एक मिसाल आंदोलन और एक विशाल आंदोलन के रूप में अंग्रेजों के प्रति खड़ा किया
असहयोग आंदोलन निम्नलिखित चरणों से गुजरा जिसकी व्याख्या इस प्रकार है:-
पहला चरण-
इस चरण में सरकारी पदों की त्याग सरकारी विद्यालय, महाविद्यालय, न्यायालय और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करना था। सरकार को करो कि आस्वीकृति ,विवादों का निपटारा के लिए पंचायत गठन किया गया ,नौकरियों के त्याग सिलाई बुनाई को बढ़ावा देना शामिल था तथा छुआछूत का निंदा किया गया और इसका त्याग भी किया गया अहिंसा कड़ाई से पालन किया जाना था। विद्यार्थी और अध्यापक सड़क पर उतर आए स्कूल , विद्यालय पर ताला लगा दिया गया कोलकाता और लाहौर में व्यापक छात्र आंदोलन हुए शिक्षक और छात्र दोनों सड़क पर यहां पर उतर आए ब्रिटिश सरकार के प्रति वहीं पर सी आर दास नेहरू ,पटेल ,आसफ अली, टी प्रकाशम वकालत छोड़ दी और आंदोलनों में व्यापारी वर्ग विदेशी कपड़ों पर पाबंदी लगा दी।
दूसरा चरण:-
इस चरण में करोड़ों लोगों की सदस्यता अभियान चलाया गया और "तिलक स्वराज कोष"का निर्माण किया गया और इसमें 2 करोड पैसे जमा हुए और 20 लाख चरखो बांटने का काम किया गया और खादी निर्माण के लिए विशेष बल दिया गया इस प्रकार से देखें तो दूसरे ने "खादी आंदोलन" का परिधान आंदोलन का प्रतीक बन गया।
तीसरा चरण:-
इस चरण में मोहम्मद अली और उनके सहयोगियों ने मुस्लिम सेनाओं को सेना में नहीं रहने की अपील किया और उसे तत्काल इस्तीफा देने को कहा नवंबर 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आगमन के समय अली द्वारा बहिष्कार किया गया और उनके समर्थकों ने मिलकर प्रिंस ऑफ वेल्स का बहिष्कार किया जहां जहां पर वेल्स गया वहां वहां पर उनका स्वागत हड़ताल , बंद दुकानों एवं हिंसा की घटनाओं ने ही किया इस कार्य करने के लिए मोहम्मद अली और उनके सहयोगियों को जेल भी जाना पड़ा।
चौथा चरण:-
इस चरण में सरकार से टकराने की मुद्रा में देखा गया 5 फरवरी से 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नामक स्थान पर चोरा चोरी कांड की घटना घट जाती है जिसमें एक पुलिस थाने को हवाले करते हैं और 23 पुलिसकर्मी मारे जाते हैं जिसके चलते इस आंदोलन की हिंसात्मक घटनाएं घट जाने गजल थे महात्मा गांधी ने इस आंदोलन को वापस ले लेते हैं।
असहयोग आंदोलन का प्रभाव :-
10 मार्च 1942 को गांधी गिरफ्तार कर लिया गया और 6 वर्ष की कारावास दे दिया गया मुस्तफा का शासन समाप्त कर दिया गया। धरमनिरपेक्षता की सिद्धांत को संविधान में शामिल कर लिया गया। हिंदू मुस्लिम की एकता शामिल किया गया।पहली बार घरों से महिलाओं ने बाहर निकला और अंग्रेजी साम्राज्यवाद विरोधी नीतियों में शामिल हुआ। आंदोलन की वापसी में नेहरू ने कहा यदि "कश्मीर में घटना होती है तो इसकी सजा कन्याकुमारी के लोग जो भुगते" दूसरी और सुभाष चंद्र बोस ने कहा "गांधी जी द्वारा लिया गया वापस आंदोलन राष्ट्र के प्रति धोखा है" आलोचना में गांधी जी ने कहा "किसी भी सूरत में हिंसात्मक घटनाएं पसंद नहीं है"।
खिलाफत और असहयोग आंदोलन का योगदान :-
दोनों आंदोलन ने धर्मनिरपेक्षता एकता छुआछूत अहिंसा का पालन किया।गांधीजी हिंदू मुस्लिम की एकता बनाए रखने डोर की जैसा काम किया साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ा ग्रामीण क्षेत्रों में किसान मजदूरों सक्रिय भूमिका निभाई। वहीं गांधी जी राजनीतिक सामाजिक सौहार्द बनाने में योगदान किया लोगों को स्वशासन पर बल दिया। जन आंदोलन साम्राज्यवादी विचार पर प्रतिबंध हुआ और चेतावनी दिया गया । पहली बार महिलाओं घर से बाहर निकले आंदोलन में शामिल हुए। हिंदू-मुस्लिम की एकता पहली बार मजबूत और उसे देखा गया पूरे भारत में एक व्यापक आंदोलन का नजर देखा गया सरकार से शांति और विरोध के माध्यम से कड़ी चुनौती ब्रिटिश सरकार को दिया ।
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" मुक्ति का मार्ग ज्ञान की प्राप्ति है"।
धन्यवाद
जय हिंद