स्वदेशी आंदोलन या बंग भंग आंदोलन तथा लॉर्ड कर्जन की "बंगाल विभाजन" नीतियां

 


बंगाल विभाजन के फलस्वरुप ही स्वदेशी आंदोलन की आगाज किया। यह आंदोलन भारत के अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया और देखते देखते ही भारी भीड़ और अंग्रेजी सरकार के खिलाफ एक जन आंदोलन के रूप में बदला जिसमें अंग्रेजी सरकार के प्रशासन को उत्तल पुथल  कर दिया।

स्वदेशी आंदोलन का परिचय:- 

19वीं शताब्दी में उदारवादी राजनीतिक पतन के चलते गरमपंथी धारा का अभिभ्राव हुआ। बंगाल में बिपिन चंद्रपाल आंदोलन का नेतृत्व किया साथ ही महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक और पंजाब में लाला लाजपत राय यानी लाल बाल पाल ने मिलकर भारत में गरमपंथी विचारधारा आंदोलन का नेतृत्व किया। आंदोलन की उत्पन्न में लॉर्ड कर्जन की बंगाल विभाजन नीति, प्रेस पर प्रतिबंध, विश्वविद्यालय ,सरकार के अधीन शोषणकारी नीतियां स्वदेशी आंदोलन या बंग भंग आंदोलन की शुरुआत मानी गई।

बंग भंग आंदोलन या स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत:-

 यह आंदोलन 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन किया गया लेकिन बंगाल विभाजन की प्रक्रिया 1903 में ही प्रारंभ हो चुकी थी लेकिन अधिकारी घोषणा 1905 में किया गया आंदोलन में लॉर्ड कर्जन बंगाल में भेदभाव उत्पन्न करना चाहता था लेकिन बंगाली लोग एकजुटता का परिचय दिया इस आंदोलन का प्रमुख नारा "आत्मबल" था जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाना था।

स्वदेशी आंदोलन की वजह लॉर्ड कर्जन की सबसे घृणित कार्य में से एक था ।बंगाल विभाजन उस समय भारत की राजनीतिक केंद्र बिंदु बंगाल था। राष्ट्रवादियों को  कमजोर करने के लिए बंगाल विभाजन को उचित समझा गरमपंथीयो को इस नीति से आंदोलन की रास्ता साफ हो गया जिसमें कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के साथ सीधी टक्कर के रास्ते पर ला खड़ा कर दिया दूसरी तरफ से गरमपंथीयोने तोड़ और संस्थानों का बहिष्कार तथा स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे विकल्पों का विकास करना था । भारत में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गठन किया गया था। स्वदेशी आंदोलन के समय शिवाजी महासंघ और गणेश  महोत्सव का आयोजन किया जो काफी लोकप्रिय साबित हुआ। स्वामी विवेकानंद द्वारा प्रस्तुत वैकल्पिक पुरुष बहुत ही इस आंदोलन को प्रभावित किया। इसमें आध्यात्मिक शक्ति और स्वनियंत्रण पर विशेष बल दिया। यह पश्चिमी की पुरुषों की भावना की विशेषता थी जिसमें खुद को राष्ट्रवादी विचारों से जुड़ा था। लॉर्ड कर्जन बंगाल विभाजन का बचाव करते हुए कहा बंगाल का विस्तार और क्षेत्रीय भाषा विविधता की वजह से प्रशासनिक चुनौतियों से निपटने के लिए बंगाल को दो भागों में बांटना जरूरी था।

 लॉर्ड कर्जन की सोच:-

लॉर्ड कर्जन की सोच में शामिल था ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैद्य बड़ी जातियां बंगाल में अपना वर्चस्व कायम रखी थी जिसमें समाज के अनेक कमजोर लोगों को काफी परेशान , शोषण भी किया करते। बंगाल में सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैद्य बड़ी जातियों का वर्चस्व कायम था। छोटे जातियों को एक अलग पहचान देना चाहता था लॉर्ड कर्जन बंगाल विभाजन करके एक अलग पहचान दे सकें। प्रशासन चलाने में आसानी होगा ।अंग्रेजी साम्राज्य बेहद आसान से चलेगी और अच्छे तरीके से राजस्व वसूली भी हो सकेगी पूरी बंगाल के बहुत से मुस्लिम और अल्पसंख्यक हिंदुओं के बीच भेदभाव को उबारने की कोशिश किया गया लेकिन देखें तो बंगाल के विभाजन और अपने तरीके से भारत पर गुलाम और नीतियां बनाना ही था।

 स्वदेशी आंदोलन की आरंभ काल:-

 यह आंदोलन का केंद्र बिंदु आत्मबल या आत्मनिर्भरता स्वदेशी नारा था । ग्राम स्तरीय को संगठन को मजबूत करना था रचनात्मक कार्यों पर जोर देना था जिसमें भारत में ही हमें यह विकल्प ढूंढना था कि जो भी संभव हो भारत में ही इसका कार्य किया या उत्पादन किया जाए। स्वदेशी वस्तुओं को ब्रांड बनाया जाए और इसे देश में ही बेचा जाए। राष्ट्रीय शिक्षा, पंचायती न्यायालय और ग्रामीण राष्ट्रीय समूह पर जोर दिया गया। रवींद्रनाथ टैगोर सांतिनिकेतन आश्रम की स्थापना किया। जो 1901 से लेकर 1906 ईसवी तक रविंद्रनाथ टैगोर की रचनाओं का पुनरुत्थानवादी प्रभाव रहा। इनके लेखन से बंगाल में एक नई ऊर्जा प्रदान किया । बांधव समिति ने स्थानीय विवादों के निपटारे हेतु पंचायतों का आयोजन करता था ताकि उनके निर्णय पंचायत में ही मिल जाए । बंगाल में नेशनल कॉलेज और स्कूल की स्थापना किया गया जो आंदोलन  को गति दिया।

बंग भंग आंदोलन में अरविंद घोष की भूमिका:-

 अरविंद घोष ने धर्म का प्रयोग किया भगवत गीता के श्लोकों को स्वदेशी स्वयं सेवकों की आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत रहा है घोष कि विचार मुस्लिम को पृथक करने की व्याख्या करती है उन्होंने आंदोलन में धर्म का सहयोग किया और भगवत गीता के श्लोकों को अनुवाद करके आंदोलन में ऊर्जा देने का काम किया।

आंदोलन के समय समितियां:-

 कुछ प्रमुख समितियां में प्रभुत्व समिति, स्वदेश संदेश समिति,  शिक्षा समिति और मध्यस्थ न्यायालय के प्रचार से जुड़े समितियां बंगाल के बाहर आंदोलन का विस्तार करने का काम कर रही थी।

आंदोलन के समय नरमपंथी और गरमपंथी:- 

उदारवादी नेता फिरोजशाह मेहता, दिनशा वाचा, गोपाल कृष्ण गोखले के विचारों का गरमपंथियों पर शक हुआ। गरमपंथि नेता  लाला लाजपत राय ने "नियंत्रण की नीति" का पक्ष लिया इसने कांग्रेस को अखिल भारतीय स्तर पर राजनीतिक को एक नया मोड़ दे दिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सम्मेलन पुणे में होना था जबकि सूरत अधिवेशन किया गया पद के लिए लाजपत राय की पेशकश किया कि जब की उदार लोग रासबिहारी बोस की पेशकश किया इसके चलते अपना नामांकन वापस ले लिया इस वजह से दोनों पंछियों के बीच झड़प मारपीट जूते चप्पल कुर्सियां फेंकी और तोड़ी गई की घटनाएं हुई और यहां से कांग्रेस का विभाजन 1907हो गया अधिवेशन से और अरविंद घोष सन्यासी होकर पांडिचेरी में स्थापित हो गया गर्म पंथी अपना रास्ता खो दिया ,गांधीजी 1920 में इसे एकजुट किया था।

आंदोलन में हिंसा की रास्ता:-

 1857 की क्रांति की गुस्सा फुटा। अनुशीलन समिति बंगाल में खुफिया सोसाइटी की गतिविधियों में बढ़ोतरी किया बारिंद्र कुमार घोष, हेमचंद्र कानूनगो और प्रफुल्ल चाकी ने अनुशीलन समिति का नेतृत्व किया समिति डकैती करना ताकि बम बनाने की सामग्री स्थापित करना, जासूसों की हत्या करना शामिल था कि 1908 को मुजफ्फरपुर में खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चाकी ने "मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड "पर जानलेवा हमला के लिए बम फेंका जिसकी वजह से ब्रिटिश सरकार अरविंदो और बारिद्र कुमार घोष को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन बाद में अरविंदो का बचाव किया गया बाकी दोषियों को सजा दिया गया।

आंदोलन का प्रभाव:-

 गोखले ने "सर्वेंट ऑफ़ इंडिया सोसाइटी" का गठन किया जिसका उद्देश्य गरीबों की सेवा करना था आंदोलन की उभार बंगाल ,पंजाब और महाराष्ट्र तक फैल गई। शिक्षित वर्ग में देशभक्ति की भावना जगी। 1906 में ढाका में "ऑल इंडिया मुस्लिम लीग" की स्थापना हुई विभाजन की नीति का समर्थन किया था। पूरी बंगाल मुसलमानों को लाभ मिला वही आपने प्रतिनिधियों की वकालत किया ।कोलकाता राष्ट्रीय भावनाओं का केंद्र बना बल्कि पुणे मुंबई अहमदाबाद दिल्ली लाहौर लखनऊ इलाहाबाद और मद्रास स्थानों पर राष्ट्रीय राजनीति का प्रवेश  हुआ। स्वतंत्रता संघर्ष में राष्ट्रवाद को उग्र हिंदू दृष्टि को रखा।

स्वदेशी आंदोलन राजनीतिक में बहुमंजिला तैयार किया गया दोनों पंथियों की विचारधारा राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया। राष्ट्रवादी केंद्र कोलकाता में था इसके अलावा पंजाब महाराष्ट्र अन्य स्थानों पर इसका विस्तार हो गया। नई पीढ़ियों की राजनीतिक आंख भर दी । आंदोलन लंबे समय तक चला जिसके चलते ब्रिटिश सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था को उत्तल पुथल कर दिया। उदासीनता क्रांतिकारी राष्ट्रवाद आजादी की भूख अपने को सर्वोच्च की लालसा भारत के दिलों में भर दिया । स्वदेशी आंदोलन की विचार आग और आंधी की तरह फैल गई आंदोलन में राष्ट्रीय गति जन गण मन लोगों के जुबान पर हुई आंदोलन में समाज के सभी लोगों शामिल हुए ।आंदोलन की भावना जगाने के लिए निबंध ,कविताओं ,लेखों , सुदूरवर्ती इलाकों में पहुंचाया गया।

 स्पष्ट है आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं स्वतंत्रता की मोड में एक बड़ी उपलब्धि है। भारतीय एवं विश्व पटल के इतिहास में एक अमिट छाप स्थापित किया।।


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 "ज्ञान की प्राप्ति ही , मोक्ष की प्राप्ति है "।

धन्यवाद

KRISHNA KUMAR

Self employed,IAS preparation and State level services prepration.

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