प्राचीन भारत में इतिहास-लेखन की परंपरा

"इतिहास अपने आप को दोहराता है"।




विश्व के अन्य देशों की तरह ही भारत की भी इतिहास-लेखन की परंपरा थी।भारतीय इतिहास-लेखन की प्राचीन परंपरा में हमारे पास वैदिक साक्षियों के साथ अभिलेखों ,स्मृत, सिक्कों,यज्ञों, चरितो,तिथियां,अभियानों,महाकाव्य, गुफाओं के चित्रलेख,वंशावलियों और पुरातात्विक साक्ष्यो हमारे पास उपलब्ध है। हम प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन की निम्न प्रमुख बिंदुओं पर गोर करेंगे 

वैदिक दानस्तुतियां:-

वैदिक प्रमाण में सबसे प्रमुख ऋग्वेद ग्रंथ है यह ग्रंथ दुनिया की सबसे प्राचीन और सबसे बड़ी ग्रंथ है इस ग्रंथ के "अष्टम मंडल" में दानश्लोक का उल्लेख है जिसे दानस्तुति कहा गया है इसमें मवेशियों को दान किया जाता था जो यज्ञ के समय प्राप्त करता। दानकरता से प्रार्थना करके प्राप्त करता था और उसके प्रति आभार प्रकट करता था। दूसरी तरफ अश्वमेध यज्ञ में घोड़े को खुले छोड़ा जाता था जिसने पुजारी हर सुबह संरक्षक का गुणगान करता, हर क्षत्रिय की सूरवीरता के कारनामों की गीत  पुराणों और महाकाव्य में शामिल किया गया ।यज्ञ और दान करता का सिलसिला प्राचीन रूप से कायम रहा और यह राजाओं की उम्मीद पर खरे उतरने का सुनिश्चित करता रहा एवं प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन में यह भूमिका निभाया।

महाकाव्यों का ऐतिहासिक विवरण:-

इसमें रामायण और महाभारत शामिल है जो एक महाकाव्य के रूप में माना गया है। महाकाव्यों की कथाओं पहली शताब्दी से मिलती -जूलती है लेकिन इसे चौथी-पांचवी शताब्दी में लिखी गई। उत्तरवरती काल में "कुरु और पंचाल" का जिक्र है यह दोनों वंशावली का उल्लेख महाभारत में किया गया है जबकि रामायण में "कौशल और विदेह" जैसी घटनाओं का उल्लेख किया गया है। पुरातात्विक उत्खनन और पर्यवेक्षण के संकेत है महाभारत से जुड़ी स्थल हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ तथा रामायण से जुड़ी अयोध्या कॉलनी बस्तियां थी। महाकाव्यों की घटनाओं के ऐतिहासिक प्रमाणिकता संभव नही है बल्कि इनका विश्लेषण किया जा सकता है। महाभारत में चंद्रवंशी तथा रामायण में सूर्यवंशी वंशावली का उल्लेख है इन वंशावली की वास्तविक नहीं हो सकती है लेकिन सामाजिक राजनीतिक जानकारी के लिए विशेष स्थान रखता हैं।



पौराणिक वंशावलीया:-

 पुराणों उतना ही प्राचीन है जितना कि महाकाव्य महाभारत में सछत कहे जाने वाले सामाजिक समूह पुराणों से मिलती जुलती ह सूतो को उतरवर्ती काल में राजा के मुख्य समर्थक या रत्नों की श्रेणी में रखा गया। राजा को हर प्रकार के कार्यों में सहयोग करता उनके साथ रहना गाथाएं सुरक्षित रखना व सुनाना शामिल था। मनुस्मृति सबसे प्राचीन स्मृति है इसमें सूत को निम्न हैसियत माना गया है ब्राह्मण राजा के निकट रहता और सूत का विरोध करता इससे स्पष्ट है सूतो का वर्चस्व अधिक रहा होगा जब महाकाव्य की रचना हुई तो अंततः ब्राह्मणों ही इनके रचयिता माने गए।पुराना में तीन प्रकार के वंशो का उल्लेख है

 संतों की वंशावली:-

 यह वंशावली ज्ञान के तर्कसंगत की प्रमाण था जो उपनिषदों और धर्म शास्त्रों से मिलती है।

 राजाओं की वंशावली:-

 पहले कलयुग से दूसरे कलयुग तक है सूर्य और चंद्र वंश की वंशावली इन वंश का वर्णन महाकाव्यों मे उल्लेख है महाभारत में मानव इतिहास की संकट का मोड़ तथा पतन युग की शुरुआत कलयुग का आरंभ माना गया ।

गुप्त वंशावली:-

उत्तर भारत में गुप्त एक शक्तिशाली था जो चौथी शताब्दी में अधिक वर्णन मिलता है इनकी साम्राज्यवादी नीति व्यापक था इन वशो का उल्लेख सिक्कों और अभियानों से मिलती है

                                 महाकाव्य के मूल्य बिदुओ को सही नहीं हो सकती है क्योंकि सत्ता के लिए  के छोटे भाइयों द्वारा संघर्ष का होना शामिल था महाकाव्य मूल्यों से हमें अतीत की कल्पना करने या गढ़ने के रणनीतियां में सहयोग करती है।



सरकारी  प्रशस्तिया:-

पुराणों और महाकाव्य मैं स्त्रियों एवं शुद्रो की श्रेणियां हैं जो ग्रंथों से बाहर रखा गया है हमें अतीत के बारे में सिर्फ समझ पैदा नहीं करना है बल्कि सामाजिक मानदंडों को भी देखना है इसी ग्रंथ में सम्राट एवं अधिक प्रभावशाली लोगों को संस्कृत में अलंकृत किया गया है।सबसे व्यापक और विख्यात प्रशस्ति समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख है जिसे इलाहाबाद स्तंभ लेख भी कहा जाता है या अशोक स्तंभ लेख पर उत्कीर्ण है जिसमें समुद्रगुप्त के विजयों और अभियानों के साथ सुदूरवर्ती शासकों के साथ सुलह की नीति का उल्लेख है इस प्रशस्ति के रचयिता कुशल कवि हरीशेन की थी दूसरी सबसे प्रसिद्ध प्रशस्ति चालूक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय की है जो सातवीं सदी में रची गई इनकी रचयिता रविकृति ने अपनी कौशल से की और इनकी तुलना कालिदास और भैरवी से कि इसमें उत्तर भारत के राजाओं को पराजित का उल्लेख है ।



सरकारी राज्यसभा में परंपराएं चरित:-

चरित्र हमेशा सभ्रात और महान व्यक्तियों के लिए लिखा जाता था यह संस्कृत भाषा में होती थी। चरित में सबसे उत्तम गौतम बुद्व के बारे में उल्लेख है जिसमें बुधचरित्र हैं यह अश्वघोष द्वारा रचा गया था । सन्यासी जीवन का चित्रण करने वाले कवि ने राज्यसभाओं की विलासिता और स्त्रियों का दृश्य चित्रण किया है यह संभवत कुषाणों की राज्यसभा का चित्रण किया गया है ।चरितो में सबसे अधिक प्रसिद्ध  हरषचरित की है जिसके रचयिता बाणभट्ट थे यह हर्षवर्धन के दरबार में रहता था। चरितो मे अन्य कौशल पूर्वीभारत के पाल शासक रामपाल का कवी संध्याकरनंदिन  ने रामचरित रचना की है । इन्होंने हमेशा आपने व्याख्या में महाकाव्य के नायक के जीवन या फिर उनके संरक्षक के संदर्भ में किया गया है ।प्रशस्ति और चरित्र में जिन शासकों का उल्लेख किया गया है किसी प्रकार की प्रतिद्वंद्वियो की उपेक्षा करके चयन किया गया था जिसमें पुलकेशिन आपने पूर्वर्ती राजा के भतीजा था जबकि हर्षवर्धन अपने बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात् राजा बना था।



प्राचीन स्रोतों में कल्हण की राजतरंगिणी:-

 प्राचीन भारत की एकमात्र ऐतिहासिक रचना राज तरंगिणी जिसमें राजाओं की नदी या उनके कार्यकालका वर्णन है जिनके रचयिता कल्हण थे जो 12 शताब्दी में लिखा था इसमें कुल 13 राजाओं का उल्लेख किया गया है जो लगभग सभी काश्मीर के शासक है पहले तीन तरंगों में कश्मीर का राजाओं का उल्लेख है । ग्रंथ में वर्ण तथा श्रेणी का कठोरता से पालन किया गया है। कल्हण अपने आप को कवी मानते थे उनके अनुसार एक कवि को दिव्य दृष्टि संपन्न और हिंदू मान्यता के अनुसार सृष्टि रचने वाले प्रजापति के समान शक्तिशाली होनी चाहिए। राजतरंगिणी में भारत की सामाजिक ,राजनीतिक आर्थिक दशाओं पर चर्चा किया गया है जो भारतीय प्राचीन इतिहास लेखन में अहम भूमिका निभाता है।

इतिहास लेखन की अन्य परंपराएं :-

इसमें अधिकांश राजाओं से जुड़ी घटी घटनाएं हैं जिसमें धार्मिक संस्थानों के प्रभाव में अन्य परंपराएं विकसित हुई जिसमें बौद्ध धर्म, जैन धर्म तथा हिंदू धर्म के संस्थाएं शामिल थी धार्मिक में बौद्ध धर्म सबसे महत्वपूर्ण था जिसमें 3 बौद्ध संगति का उल्लेख किया गया है तथा मठों में गौतम बुध से जुड़ी चिन्हों और उनके सिद्धांतों को दर्शाया गया है मठ से गांव भूमि और अन्य समाज तथा नगद राशि राजाओं को धर्मदाय के रूप में मिलती थी शासन और मठों के बीच निकट संबंध था जो दीपवंश और महावंश इतिवृत्त में दर्ज किया गया।

प्राचीन इतिहास लेखन में तिथि निर्धारण पद्धतियां-

प्राचीन तिथियों को जानना महत्वपूर्ण होती है इसमें शासन वर्षों का प्रयोग किया गया था। राजा शासन शुरू करने के वर्ष का पहला वर्ष मानते हुए अपने शासन का हिसाब-किताब रखता था यह पद्धति मौर्य शासक अशोक ने अपनाई थी अशोक में आपने अभिषेक की तिथि को शासन का शुरुआत था। गुप्त काल की तिथियां में सबसे ज्यादा उदाहरण गुप्त काल में मिलती है जिन की शुरुआत 320 इसा आंकी गई है प्रथम शासक चंद्रगुप्त प्रथम के लिए माना जाता है जबकि चंद्रगुप्त द्वितीय का काल में तिथि गन्ना 80 वर्ष के पश्चात की गई।



विक्रम और शक संवत की तिथियां:-

यह दोनों संवत दो शताब्दियों तक बना रहा दोनों संवत संभवत राजश्री मूल के जन्मे हैं लेकिन कौन से राजाओं से संबंध है इस पर सर्वसम्मति तो कम है या एकदम नहीं है विक्रम संवत उत्तर भारत के अन्य राजाओं की उपाधि विक्रमादित्य से उल्लेख किया गया है जबकि शक संवत की शुरुआत प्रख्यात को शाक शासक के शासनकाल से मानी जाती है कुषाण और शक दो मध्य एशिया के विभिन्न जनसमूह थे शक विदेशियों के लिए भी जातिगत शब्द रूप में प्रयोग किया जाता था और किसानों के शुरू होने वाले योग के रूप में प्रयुक्त किया जाने लगा था यानी दोनों संवत पर इतिहासकारों की मत में भिन्नता है ।

निष्कर्ष:-

भारतीय इतिहास  प्राचीन -लेखन कला कायम रहा और भलीभांति विकसित हुआ था। तिथि गन्ना के लिए कई नियमों का अपनाया गया। वैदिक पुराणों ,अभिलेखों ,सिक्कों पुरातात्विक साक्ष्य प्राचीन इतिहास के लेखन की परंपरा है। पुरातात्विक साक्ष्यों के छेड़छाड़ ग्रंथों में किया गया है। ग्रंथ और अभिलेख एक दूसरे से भिन्नता है जबकि ग्रंथ सामाजिक आर्थिक ,राजनीतिक जानने के लिए उत्तम स्रोत है कल्हण की  लेखन राजाओं के प्रति अधिक ढाल को दिखाते हैं इनकी तेवर और लेखन शैली अलग थी जब हम समाज के संभ्रातो की इतिहास की तलाश करते हैं तो हमें समस्याओं का सामना करना पड़ता है,जो प्राचीन लेखन इतिहास से हमें कुछ सीमित परंपराओं का आभास होता है।

 धन्यवाद


KRISHNA KUMAR

Self employed,IAS preparation and State level services prepration.

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