चिपको आंदोलन" के जन्मदाता सुंदरलाल बहुगुणा अब हमारे बीच में नहीं , इनकी पर्यावरण की विचारधारा दुनिया के लिए प्रेरणादायक है

 "वन है तो जीवन है ,वन के बिना जीवन अधूरा है"




पर्यावरण से ही जैवविविधता कायम है पर्यावरण से ही चारों ओर इस पृथ्वी पर स्थित जीव-जंतु का जीवन कायम है। पर्यावरण है तो हम सब हैं पर्यावरण की नास हुआ तो समस्त पृथ्वी का नास हो जाएगा। भारतीय सभ्यता संस्कृति में पर्यावरण बचाओ व सुरक्षा के लिए परंपरा रही है। चिपको आंदोलन के समानांतर "राजस्थान के सुप्रसिद्ध खेजड़ी पेड़ सुरक्षा आंदोलन" की तुलना की जा सकती है। चिपको आंदोलन मुख्यता उत्तराखंड के वनों की सुरक्षा को लेकर 1970 के दशक में प्रारंभ किया गया इस आंदोलन का नेतृत्वकर्ता सुंदरलाल बहुगुणा था।  उत्तराखंड  उस समय उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। आंदोलन ब्रिटिश काल से उत्पन्न मानी जाती है। अंग्रेजों की "वन अधिनियम" ही चिपको आंदोलन का परिणाम है ।उत्तराखंड के पहाड़ी समुदाय के लोगों की दैनिक आवश्यकताओं के वनों का उपयोग से अंग्रेज ने वंचित कर दिया था। कुमाऊं और गढ़वाल के क्षेत्र में वनों की विशेषता थी और पूरे ग्रामीण समुदाय व पहाड़ी समुदाय अपने जीवन से संबंधित वनों पर निर्भर थे ।

कुमाऊं और  गढ़वाल वनों की विशेषताः

हिमालय मे बहुत संवेदनशील पारितंत्र हैं।वन संसाधन इसकी एक प्रमुख विशेषता में से था। अनेक जीवो का आवास था। जाड़े के मौसम में भारी हिमपात की स्थिति में जल एवं मिट्टी का बचाव चौड़े पत्ते और मिश्रित वनों की केंद्रीय भूमिका होती थी। पहाड़ों में कृषि और पशुपालन के लिए पहाड़ी समुदाय पशुपालन करते थे। पहाड़ी लोगों की अर्थव्यवस्था वनों पर निर्भर थी।वन से भौतिक वस्तुएं जड़ी बूटीयां ,हरी पत्तियां, घास जानवरों के लिए वाचारा उपलब्ध होता था पशुपालन से पहाड़ी लोगों को गाय के गोबर प्राप्त होता जो फसल उत्पादन के लिए सहायक होती थी। सुखी टहनियां और लकडियों घरेलू इंधन का एकमात्र स्रोत है जो लोग अपने जीवन के लिए भोजन पकाने में इस्तेमाल करते थे।घरों की ढांचा बनाने के लिए लकड़ियां वनों से प्राप्त होती थी। स्थानीय लोगों के लिए फल, फूल ,शुष्क , रेशेदार फल और जड़ी बूटियां इन वनों से प्राप्त होती थी।अंग्रेजों की नीतियां पहाड़ी लोगों के लिए जीवन में कष्टदायक बन गया और यह लोगों ने चिपको आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अंग्रेजों का आदेश गढ़वाल क्षेत्र में:-

1850 मैं अंग्रेजों ने गढ़वाल क्षेत्र को गढवाल वन क्षेत्र को किराए पर ले लिया। 1864 में इन क्षेत्रों में 20 वर्षों के लिए लीज पर ले लिया। 1895 में इन वनों को गढ़वाल प्राशासकों के अधीन कर दिया गया। अंग्रेज की इस प्रकार से वनों का अंधाधुंध प्रयोग करने और अपने लाभ के लिए वनों का विनाश की नीति बनाई गढ़वाल में अंग्रेज के अधीन वन होने पर लोगों की प्रतिक्रिया इस प्रकार से थी-



सुंदरलाल बहुगुणा की रिपोर्ट के अनुसार 1907 मे संगठित स्वरूप प्रदान किया गया और अंग्रेजो के खिलाफ व्यापक रणनीति बनाया। मूलभूत आवश्यकताओं के लिए पहाड़ी लोग ने  अंग्रेजी प्रशासक के विरोध करता रहा ।1930 में गढ़वाल के लोग असहयोग आंदोलन को छेड़ दिया जिसमें किसी भी प्रकार के अंग्रेजों के सहयोग नहीं देना यह आंदोलन वन के मुद्दे पर केंद्रित था जो एक व्यापक आंदोलन में बदल गया। गढ़वाल पहाड़ी लोगों की संघर्षों से अंग्रेजों के प्रति विपरीत प्रभाव बना जो आजादी के बाद भी आंदोलन बनी रहे। । 27 मार्च 1973 में गोपेश्वर किसानों के समूह ने पेड़ काटने की बचानव के लिए छोटी छोटी घटना चिपको आंदोलन में बदल गया। और देखते-देखते पूरे भारत में इस आंदोलन का व्यापक समर्थन मिलने लगा चिपको आंदोलन  की घटना का विवरण इस प्रकार है:-

राज वन विभाग पेड़ की नीलामी इलाहाबाद की एक खेलकूद के सामान बनाने वाली कंपनी के नाम पर कर दिया गया। मंडल गांव के लोगों ने पेड़ों को गले लगा लिया ताकि कंपनी के मालिक पेड़ को न काट सके।सभी पहाड़ी लोग पेड़ों की सुरक्षा के लिए पेड़ों में चिपक गए और इस प्रकार से चिपको की संज्ञा दी गई सुंदरलाल बहुगुणा परिवहन विभाग में बुकिंग की नौकरी छोड़कर चिपको आंदोलन में कूद पड़े और चमोली जिला तक पदयात्रा किया और इस आंदोलन का नेतृत्व करना प्रारंभ कर दिया इस प्रकार से देखें सुंदरलाल बहुगुणा चिपको आंदोलन को सफल बनाने के लिए आपने  को सरकारी नौकरी का त्याग किया और पर्यावरण के प्रति समर्पित हो गया।

चिपको आंदोलन एक राष्ट्रीय अभियान:-
चिपको आंदोलन का व्यापक समर्थन राष्ट्रीय स्तर पर मिला क्योंकि किसी भी देश की पारितंत्र व्यापक होती है। लोगों ने पर्यावरण सुरक्षा को लेकर जन समर्थन दिया लोगों द्वारा वन संसाधनों की मांग करने लगे और इनकी सुरक्षा भी वन प्रबंधन में सामाजिक दायित्व हो जिसमें पारितंत्र की सुरक्षा सुलभ हो सके ताकि पर्यावरणीय तथा मानव जीवन कायम रहे। गढ़वाल के लोग "सतत् विकास"को बढ़ावा दिया। वन संपदा का दोहन ना हो इसके लिए बड़े पैमाने पर चिपको आंदोलन का अख्तियार किया। आंदोलन धीरे-धीरे पूरे राष्ट्रीय स्तर पर फैला जो जन समर्थकों द्वारा  समरथन मिला  और आंदोलन तेजी से फैला जिसके चलते भारत सरकार ने "वन सुरक्षा अधिनियम" पारित करवाने में सफल रहा।

आंदोलन की सफलता :

उत्तर प्रदेश के 1000 मीटर की अधिक ऊंचाई तक किसी भी प्रकार की पेड़ कटाई पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके साथ पश्चिमी घाट और विंध्य के जंगलों को सफाई पर प्रतिबंध लगवाने में चिपको आंदोलन काफी हद तक सफल रहा। राष्ट्रीय स्तर पर "भारतीय वन नीति"के लिए दबाव बनाया। यह नीति पारितंत्र विकास में अधिक संवेदनशील था। चिपको आंदोलन गैर-आर्थिक को बढ़ावा दिया। पारितंत्र के अनुरूप विकास को बढ़ावा दिया। पहाड़ी लोग तथा देश के आम जनता की पहल पर "वन हरण" के मंसूबों पर पानी फेर दिया तथा सुंदरलाल बहुगुणा ने गांधीवादी अहिंसात्मक विरोध को फिर से उजागर कर दिया और एक बड़ी आंदोलन के रूप में खड़ा कर दिया जो देश में "गांधीवादी विचारधारा" बनाए रखने में चिपको आंदोलन की एक बड़ी भूमिका रही।



चिपको आंदोलन से भारतीय लोगों को पर्यावरण सुरक्षा को लेकर एक जागरूकता अभियान रहा। अंग्रेजों की शोषण नीतियां आजादी के बाद प्रभाव को खत्म करने में योगदान दिया। सुंदरलाल बहुगुणा अपनी जनसमर्थन के माध्यम से इलाहाबाद कंपनी के मंसूबों पर पानी फेर दिया। चिपको आंदोलन "भारतीय वन नीति" लागू करवाया। भारत सरकार वन सुरक्षा पारितंत्र एवं जैव -संपदा के लिए कानून बनाए इसके अलावा भारतीय वन्य प्राणियों के लिए समय-समय पर अधिनियम बनाए गए जो कहीं ना कहीं चिपको आंदोलन की प्रेरणा से ही भारत सरकार अधिनियम पारित किए हैं। प्रकृति की गोद में बसाया गढ़वाल क्षेत्र "भारतीय इतिहास" के पन्नों में छा गया आने वाले पीढ़ी और पर्यावरण का विनाश करने वालों के लिए एक संकेत छोड़ दिया हमें पर्यावरण के बिना नहीं जीना है पर्यावरण है तो हम सब जीवित है वरना हम सब मृत हैं। सुंदरलाल बहुगुणा की सहारानिय कार्य इतिहास और दुनिया याद रखेगी।  दुखी की बात है कि 2022 में सुंदरलाल बहुगुणा दुनिया को अलविदा कह दिए लेकिन उनकी विचारधारा और सिद्धांत दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया है। वर्तमान और आने वाली पीढ़िय शायद या विश्वास नहीं कर पाएगी कि सुंदरलाल बहुगुणा जैसे व्यक्ति पर्यावरण बचाव के लिए आदम साहस और वीरता के साथ खड़ा हो गए और उसने यह तय किया पर्यावरण नहीं रहेगा तो इस पृथ्वी पर जीवन भी कायम नहीं हो पाएगा इसलिए सुंदरलाल बहुगुणा की सोच पर्यावरण से ही सब कुछ संभव है इन्होंने वृक्ष कांटो रोको अभियान के तहत प्रसिद्धि मिली जिसमें पेड़ पौधों को बचाने के लिए उत्तराखंड के गढ़वाल में लोग पेड़ों में चिपक गए थे जिसमें वहां के ठेकेदार पेड़ नहीं काट पाए। और सुंदरलाल बहुगुणा की विजय हुई तथा भारत सरकार की ओर से आदेश जारी किया गया गढ़वाल के क्षेत्र में कोई भी पेड़ पौधा नहीं काटा जाएगा।

जय हिंद  

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धन्यवाद





KRISHNA KUMAR

Self employed,IAS preparation and State level services prepration.

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