पंचायती राज्य चुनाव होने से लोकतंत्र में बढता प्रभाव, स्थानीय शासन से आम आदमी तक पहुंच हुई

अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड मिंटो को ही भारत में सांप्रदायिक चुनाव का पिता कहा गया है।1909 का मरले -मिंटो अधिनियम से ही भारत में जातिवाद या वोट बैंक की राजनीति का निर्वाचन तय किया गया। 1919 में चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम के तहत इसे और तिल दिया गया जो आज भारत में जातिवाद चुनाव की एक बड़ी समस्या है। अंग्रेज ना होता तो भारत में जातिवाद का जहर का बीज भी नहीं बोया जाता। जातिवाद का बोया गया बीच आज 21वीं शताब्दी में यह एक वृक्ष बन गया है जो कहीं ना कहीं फट जाता है। आज भारत में राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव के लिए धर्म का लक्षण दिखते हैं जबकि स्थानीय स्तर पर जाति का प्रभाव दिखता है जिस जाति का जितना पल्ला भारी है उस जाति का उतना ही जीत भारी है। चुनाव में हर कोई अपने रिश्तेदार को ढूंढते हैं। रिश्तेदार नहीं भी है तो उसे रिश्तेदार बना रहे हैं और आपने बिरादरी में शामिल करके उसे वोटर बना रहे हैं और यह वचन देता है कि हम अपनी जाति का विकास भरपूर करेंगे।


गांधी जी के विचारों को जिंदा रखने के लिए ग्राम स्वराज्य के तहत ही पंचायत गठित हुई है।" समाज के अंतिम पायदान व्यक्ति का विकास ही समाज का विकास हैं"।भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक लॉर्ड रिपन को कहा जाता है इसके साथ भारत में पंचायतों के विकास के लिए सबसे पहले बार बलवंत राय मेहता समिति की रिपोर्ट के आधार पर पंचायत प्रणाली को देश मे सबसे पहले राजस्थान के नागौर जिले में लागू किया गया ।अनुच्छेद-40 के तहत राज्य को अधिकार है कि आपने सीमावर्ती राज्य में पंचायत की गठन करें। भारतीय संविधान का संशोधन अधिनियम 1993 का 73वे संविधा संशोधन के तहत पंचायत लागू हुआ। संविधान के भाग -IX में है और XIवी अनुसूची  में पंचायत का उल्लेख किया गया है। भारत में पंचायत चुनाव एक संवैधानिक अधिकार हैं पंचायतों के तहत स्थानीय स्तर की प्रशासन संभालने के लिए जनप्रतिनिधियों को अधिकार दिया गया है जबकि यह अधिकार किसी भी राज्य सरकार द्वारा दिया जाता है। डॉ मनमोहन सिंह की सरकार में 24 अप्रैल 2010 को पंचायती दिवस मनाने की घोषणा की गई जो प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को पंचायती दिवस मनाया जाता है ताकि समाज के प्रत्येक लोगों के कल्याण और भागीदारी के साथ देश का विकास 

स्थानीय चुनाव मे प्रतिनिधि का वर्चस्व:

स्थानीय चुनाव में समाज के हर कोई मे विचार पनपता है कि अपने ही जाति से संबंधित लोगों को ही मतदान करेंगे। समाज मे अलग-अलग समूह में रहने वाले जातियों की संख्या एक नहीं हो पाती है लेकिन अलग क्षेत्रों में उन जातियों की संख्या अधिक हो जाती है और वह इस तरीके से अपनी जीत का मिसाल पेश करता है उसी प्रकार से अन्य जातियां भी आपने जीत के तरीके के लिए यह नीति अपनाता है इसी तरह से स्थानीय चुनाव में लगभग एक पंचायत के 25 से 30 जनप्रतिनिधि पंचायत स्तर पर खड़े हो जाते हैं और वह अपनी जाति का समीकरण तय करके जीत का नमूना तैयार करते हैं यदि वह अपनी जातीय समीकरण में जीत जाता है तो अन्य जातियों का विकास ना के बराबर करता है। स्थानीय चुनाव जातिवाद को बढ़ावा दे रहा है जिस प्रकार से स्थानीय चुनाव जिस उद्देश्य के लिए गठित किया गया था उस नियम पर खरे नहीं उतरा।आज पंचायत के चुनाव में जातिवाद का लहर देखी जा रही है जिसके समाज का सामाजिक संतुलन का सौहार्द बिगड़ सकता है और समाज में रहने वाले अल्पसंख्यक लोग भी स्थानीय स्तर पर ज्यादा डरा हुआ महसूस करेंगे।



स्थानीय स्वशासन का चुनाव बेहद मुश्किल भरे काटे:

 स्थानीय चुनाव में स्पष्ट रूप से जाति का लक्षण दिखता है क्योंकि प्रतिनिधि अपनी जातियों का समीकरण मिलाकर जीत की घोषणा और रणनीति तय करता है  और स्थानीय स्तर के प्रतिनिधि बनने में समस्या हो जाती हैं क्योंकि जितना गर्मी के मौसम मे गर्मी जितना पसीना होता है उतना से अधिक पंचायत के प्रतिनिधि बनने में बहाना पड़ता है लगभग 20 से 25 मुखियाओं एक पंचायत के लिए खड़े होते हैं । और जीत उसी प्रतिनिधि का होता है जिस पंचायत में उसी बिरादरी के लोग कि अधिक संख्या हो और वह हमेशा जीत की गुल खिलाता है लेकिन राज्य सरकार को ये अधिकार है कि समाज में यदि कोई समय जाति ,लिंग पिछड़ा हुआ है तो उसे लोकतांत्रिक अधिकार के माध्यम से समाज मे समानता के आधार पर आगे लाना के लिए नीति तय करता है लेकिन सत्य है सरकार की यह नीति  स्थानीय स्तर पर निर्बल हो जाती है और स्वर्ण लोगों की वर्चस्व परवान चढ़ती है।आज का पंचायती चुनाव एक जाति आधारित के लक्षण दिखते हैं जबकि राज्य सरकार इसको नियंत्रित भी करती है लेकिन सत्य है सरकार भी झुक जाती है और समाज में फिर से जिस जाति की संख्या अधिक है उसका लाठी मजबूत हो जाती है। भारतीय संविधान में दिया गया अधिकार के बावजूद भी स्थानीय स्तर पर फीका पड़ने लगता है।


स्थानीय चुनाव में जनता का विचार:

जनता भी भरपूर स्थानीय चुनाव का लाभ उठाता है क्योंकि जनता के पास अधिक विकल्प आ जाता है कि वह किस बिरादरी को वोट दें उसी के हिसाब से वह जनप्रतिनिधि के सामने अपना एजेंडा तय करता है और कार्यकर्ता अपने तरीके से कार्य करता है। स्पष्ट है जनता को ज्यादा अवसर मिलती है हम कौन सा प्रतिनिधि को चुने जाति के आधार पर चुने या विकास के आधार पर चुने या  सामाजिक कल्याण के आधार पर चुने या फिर बल द्वारा डरा धमका कर उसे अपने और खींचना या उसे आगामी योजना का लाभ ना देकर उसे अपनी ओर खींचना यह भी भारतीय समाज के स्थानीय चुनाव में लक्षण दिखाई पड़ते हैं। जनता भी अपने तरीके से अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं यदि लगता है कि उसे पंचायत में उसके समूहो की  संख्या अधिक है तो आपने ही कुल के छत्रछाया में रहकर मतदान कर देता है  कुछ ऐसे जनता हैं जो जाति दलगत भावना से ऊपर उठकर पंचायत के सर्वांगीण विकास के लिए मतदान करता है और एक अच्छे समाज की कल्पना करता है।



स्थानीय चुनाव में राज्य और केंद्र स्तर के प्रतिनिधियों की भूमिका:

स्थानीय चुनाव में बड़े प्रतिनिधि भी कमर खोज लेते हैं। राज्य और केंद्र स्तर के प्रतिनिधि भी स्थानीय चुनाव के अभियान में बढ़कर भाग लेकर अपने पक्ष के प्रतिनिधियों का मतदान के  लिए अपील करता है क्योंकि बड़े प्रतिनिधि छोटे प्रतिनिधि का सहयोग नहीं करेगा और विपक्ष का प्रतिनिधि अभी चुनाव जीत जाता है तो आला के प्रतिनिधि को जितने की खतरा कम हो जाती है अक्सर कहा जाता है कि भारतीय पंचायत चुनाव बड़े नेताओं का दबदबा हो जाने के चलते चुनाव की हवा उसी के उंगली के आधार पर हो जाती है यदि किसी पंचायत में अलग दल के प्रतिनिधि चुनाव जीत जाते हैं तो उस क्षेत्र का जनपतिनिधि शंका और डर भय उत्पन्न हो जाता है कि मेरा चहेता कम हो रहे हैं इसलिए स्थानीय चुनाव में अपने हिसाब से किसी भी विधानसभा और लोकसभा सीटों के क्षेत्रों के अंतर्गत प्रतिनिधि लोग अपने हिसाब से पंचायत के प्रतिनिधि बड़े पदों के लिए तय करते हैं ताकि उनकी हर कमान अपने हाथों में रहे और वह अपने क्षेत्र में शहंशाह बना रहे मैं कहता हूं बड़े प्रतिनिधियों को इसमें दखल नहीं देनी चाहिए क्योंकि लोकतंत्र की इस त्यौहार में जनता को भी अपने तरीके से जीने और स्थानीय स्तर तक शासन करनी देनी चाहिए क्योंकि लोकतंत्र की क्रांति का तीसरी स्तर मे विकेंद्रीकरण "पंचायत और नगरपालिका" से है। बड़े प्रतिनिधि के दबाव में चुनाव की  जीत होती हैं या जाति वंश के आधार पर जीत आती हैं तो आने वाला भविष्य मैं स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पाएगा और वह प्रतिनिधि के चित्र पर ही दाग लगेगा और वह देश के लिए अच्छा शासक नहीं बन पाएगा इसलिए स्थानीय चुनाव बड़े जनप्रतिनिधियों का वर्चस्व नहीं होनी चाहिए।


स्पष्ट है स्थानीय चुनाव में स्थानीय प्रतिनिधि आपने ऑफिस मे दिन-रात समीकरण बैठाते हैं कौन सा गांव कौन सा क्षेत्र में अपना आदमी है अपना जाति या अपना वंश अपना कुल का है उसी के हिसाब से वह मैदान में अपना धोती खोश लेता है और चुनाव के मैदान में कूद जाता है और वह धन भी अच्छा खासा बहता है। स्थानीय चुनाव में जाति का लक्षण साफ पानी की तरह दिखता है ,इसके साथ ही लोकसभा विधानसभा के नेताओं का प्रभाव भी दिखता है इसके अलावा स्थानीय स्तर पर बहुत संख्या का गांव के लोगों भी छोटे समूहों को अपनी ओर खींच कर अपनी जीत की श्रेष्ठा की श्री गणेश करता है और अपने वंश या जाति का प्रभाव बनाए रखना चाहता है। वह किसी दूसरे जाति में या उसके अंदर में रहकर नहीं रहना चाहता है। देश का चुनाव हो, राज्य का चुनाव हो या स्थानीय स्तर की चुनाव हो जनता अपने प्रतिनिधियों को अपने अनुसार योग्य ,कर्मठ ,अनुशासित ,साफ छवि को ही अपना प्रतिनिधि चुने और जनता चुनाव करते समय उनकी जाति और धर्म ना सोचे क्योंकि जाति और धर्म एक प्रकार से अफीम की नशा है और यह नशा जिसको लग जाती है तो फिर वह अपना रूप बदल देता है। स्थानीय चुनाव में हर कोई अपने तरीके से अपने प्रतिनिधि को चुने अपने पंचायत का विकास करें ,अपने गांव का विकास करें, आपने अनुसार योजना बनाकर अपने गांव का विकास करें और जाति का लक्षण दूर रहकर और  धर्म का लक्षण से दूर रहकर हम एक इंसान का धर्म मान कर और लोकतंत्र की व्यवस्था बनाए रखने के लिए अवश्य मतदान अवश्य करनी चाहिए


धन्यवाद

KRISHNA KUMAR

Self employed,IAS preparation and State level services prepration.

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