भारतीय के आधुनिक इतिहास में "गोलमेज सम्मेलन" का महत्व

           तीनो गोलमेज सम्मेलन लंदन में आयोजित

गोलमेज सम्मेलन का आयोजन लंदन में किया गया था। ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेमसे मैकडोनाल्ड ने औपचारिक रूप से इसका उद्घाटन किया।  भारत से संबंधित प्रशासन को चलाने के लिए यह सम्मेलन किया गया था‍ ताकि भारतीय राजनेताओं को तुष्टिकरण किया जाए और भारत के प्रशासन तथा ब्रिटिश सरकार के प्रभुत्व चीर समय तक कायम रहे।

सम्मेलन का उद्देश्य और कार्यक्षेत्र ब्रिटिश सरकार की तरफ से "डोमिनियन स्टेटस"था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार करने का निर्णय लिया था और इसका लक्ष्य "पूर्ण स्वाधीनता की प्राप्ति" करने के लिए तय किया मार्च 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया गया। दांडी मार्च में हजारों गिरफ्तारियां, लाठीचार्ज ,महिलाओं और बच्चों पर जुल्म ढाना, पत्रिकाओं को धमकी देना, राजनीतिक उथल-पुथल के बीच ब्रिटिश सरकार ने 16 नवंबर 1930 से 24 दिसंबर 1932 तक लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया।

प्रथम गोलमेज सम्मेलन:-

प्रथम गोलमेज सम्मेलन की तीन बुनियादी मांग थी नई सरकारों का एक रूप अखिल भारतीय, संघ का होना ,संघ की सरकार कुछ शर्तों के साथ संघीय विधायिका के समक्ष जवाबदेही होगी प्रांतों को स्वायत्तता होगी। सम्मेलन की समाप्ति रेमसे मैकडोनाल्ड प्रथम गोलमेज सम्मेलन समाप्त हो जाती है। प्रथम गोलमेज सम्मेलन में 16 नवंबर 1930 को आयोजित हुआ जिसमें कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेताओं ने भाग नहीं लिया तथा महात्मा गांधी ने भी इस सम्मेलन में भाग नहीं लिया क्योंकि महान दिग्गज नेताओं जेल में बंद कर दिया गया था सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान "नमक कानून का उल्लंघन" करने के जुर्म में सभी भारतीय नेताओं को जेल के सलाखों में डाल दिया गया था।

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन

मार्च 1931 में गांधी इरविन समझौता को स्वीकार किया गया जिसमें गांधीजी की 11 मांगों को स्वीकार किया गया सभी राज्य की कैदियों को रिहा करने के लिए हस्ताक्षर हुआ कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लिया 1 सितंबर से 1 दिसंबर 1931 तक कांग्रेस के अकेले प्रतिनिधि गांधी गोलमेज सम्मेलन का प्रतिनिधित्व लंदन में किया लेकिन जटिल संप्रदायिक समस्या को सुलझाने में नाकामयाब रहे जिन्ना को काफी जगह दिया गया इसी बीच में मुस्लिम लीग के महान नेता मोहम्मद अली जिन्ना को भारत मंत्री सर सैमुअल होर का गुप्त समर्थन मिला जिसके चलते जिन्ना मुस्लिम अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व की अपनी मांग पर अड़ गए गांधी खाली हाथ भारत लौट आए। भारत आने पर गांधी को ब्रिटिश सरकार विभाग के लिए आपसी सहमति से किसी समझौते के ना होने का बहाना बनाकर बड़ी सरकार विभिन्न समुदायों आबादी के अनुपात में "मात्रात्मक प्रतिनिधित्व" का कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़े इसके चलते 1932 का बदनाम "कम्युनल अवार्ड" सामने आया 

कम्युनल अवार्ड में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की जगह दिया गया था। ब्रिटिश सरकार की विभाजन की नीतियां स्वर्ण हिंदुओं और अनुसूचित जाति के लेकर एक अलग पहचान और क्षेत्र एवं निर्वाचन प्रतिनिधित्व पर और राजनीतिक अलगाव को बचाने के लिए महात्मा गांधी ने भूख हड़ताल किया जिसे 1932 में पूना पैक्ट गांधी और अंबेडकर के बीच में संपन्न हुआ । भारत में अनुसूचित जातियों के लिए केंद्रीय और प्रांतीय विधानसभा परिषद में आरक्षण की व्यवस्था किया गया और कम्युनल अवॉर्ड को दरकिनार कर दिया गया ब्रिटिश सरकार की संप्रदायिक मनसा को धूमिल कर दिया । महात्मा गांधी ने और सरकार के विभाजन कार्य नीतियां भी नाकामयाब किया।

तृतीय गोलमेज सम्मेलन

यह सम्मेलन 17 नवंबर से 24 जनवरी 1932 तक लंदन में ही आयोजित हुई ब्रिटेन की कंजरवेटिव सरकार के 46 प्रतिनिधि भाग लिए इस सम्मेलन में उप समितियों की रिपोर्ट सुनी गई जो द्वितीय सम्मेलन में लिखी गई थी और बहस मुहावरों के आधार पर बनी ।भारत में नए संविधान की बात बनी और सहमति बनी। भारतीय नागरिक अधिकारों को ठंडा करके  बक्से में डाल दिया गया एक प्रकार से भारतीय नागरिकों के अधिकारों को ठंडा करके बंद बक्सों में डाल दिया गया कोई खास कार्य नहीं हुआ। तीसरे गोलमेज सम्मेलन में मार्च 1935 में सम्मेलन को सभी विचार बिंदुओं पर एक श्वेत पत्र जारी किया गया जिसे 1935 का अधिनियम कहा गया इस रिपोर्ट में कुछ बातें थे जिसमें रियासतों के राजवाड़ा का नामांकन का प्रावधान था ।केंद्रीय विधायकों के दूसरे सदन का उन्मूलन था। प्रांतों के दूसरे सदन का भी उन्मूलन था। संघीय न्यायालय पर शक्तियों की बंदिशों बढ़ाई गई इस प्रकार को अंतिम में 1935 में ब्रिटिश संसद में एक अध्यादेश द्वारा प्रस्तुत किया गया और इसे पारित हो जाने और बादशाह की मंजूरी के बाद 1935 में भारत सरकार अधिनियम बना दिया गया तृतीय गोलमेज सम्मेलन में गांधी ने भी भाग नहीं लिया क्योंकि इसे कुछ होने जाने वाला था नहीं लेकिन डॉक्टर बी आर अंबेडकर ने तीनों गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया इसके अलावा अन्य नेताओं ने भी भाग लिया।

गोलमेज सम्मेलन एक प्रकार से भारतीय प्रशासन को चलाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने लंदन में एक बैठक बुलाई ।भारत के विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा करनी थी ।भारत के अनेक नेताओं को तुष्टिकरण नीति अपनाने थी और भारत में एक लंबे शासन रहे ब्रिटिश सरकार भारत में कायम रहे। गोलमेज सम्मेलन में गांधीजी द्वितीय सम्मेलन भाग लिए इसके बाद वह गए ही नहीं द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में मोहम्मद अली जिन्ना अपने संप्रदायिक आधार पर मुस्लिमों का अलग प्रतिनिधित्व क्षेत्र और देश  की मांग पर आ रहे हैं जिसमें कोई बात नहीं हुआ। दूसरा सम्मेलन असफल हो गया और पाकिस्तान की मांग भी जोर होने लगी अंततः गोलमेज सम्मेलन का परिणाम 1935 अधिनियम के रूप में हुई जो 1947 तक में कार्य करता रहा और अंग्रेज की तरफ से या अंतिम अधिनियम प्रस्तुत किया गया।


आर्टिकल अच्छे लगे तो शेयर जरूर करें 

धन्यवाद






KRISHNA KUMAR

Self employed,IAS preparation and State level services prepration.

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने