देश के विभाजन से आम नागरिकों की पीड़ा उत्पन्न होती है सरकार और देश के लोग ध्यान रखें विभाजन किसी भी सूरत में ना होने दें। भारतीय विभाजन के इतिहास में अंग्रेजी शासनकाल काल की नीतियां ही भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ।
भारत का विभाजन कांग्रेस द्वारा स्वीकार करने की सबसे बड़ी वजह अंग्रेजों की नीतियां थी जिसमें "फूट डालो और शासन करो" सबसे बड़ी जिम्मेवार थी वामपंथी लोग यही कहते हैं कि अंग्रेज की फूट डालो और शासन करो नीति सबसे घृणित कार्य में से एक थी जिसकी वजह से भारत का विभाजन हुआ और एक नए देश पाकिस्तान का निर्माण हुआ। कांग्रेस और महात्मा गांधी विभाजन स्वीकार करने की वजह में सबसे बड़ी वजह अंग्रेज नीतियां को ही मानते है। नीतियां में "फोटो डालो शासन करो" नीतियां सबसे बड़ी विभाजन का कारण है।
विभाजन को स्वीकार करने के निम्न कारण बताया जाता है-
@.फूट डालो और राज करो की नीति जिम्मेवार सबसे बड़ी वजह मानी गई है वामपंथी लोगों में सबसे बड़ा आरोप अंग्रेज की नीतियों पर ही लगाया गया है।
@. समाजवादियों और भारतीय बुजुर्ग लोगों के बीच व्यापार के रूप में वर्णित किया गया है अंग्रेजों की नीतियां।
@. भारतीय कांग्रेस नेताओं में सत्ता के प्रति लालसा थी जो कि देश की जनता के साथ धोखा था और कांग्रेसी नेताओं आजादी के लिए आतुर थे किसी भी तरह से भारत की आजादी होना चाहिए जिसमें अंग्रेजों के नीतियां भी कांग्रेसी नेताओं के लिए मानना बाध्य किया।
@. महात्मा गांधी ने अपने बयान में कहा था कि मुझे 125 वर्षों जीने की कोई चाह नहीं है यानी कि महात्मा गांधी भी आजादी को जल्द से जल्द प्राप्त करना चाहते थे ताकि भारतीय लोग अपने सम्मान और आत्म सम्मान एवं गरिमा पूर्ण जीवन जी सकें.
विभाजन में गांधीजी का पक्ष इस प्रकार है:-
@.महात्मा गांधी भारत का विभाजन नहीं चाहते थे महात्मा गांधी मोहम्मद अली जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे और माउंटबेटन वायसराय के सामने प्रस्ताव भी पेश किया। गांधी को लगा जिन्ना के लक्ष्यों को संतुष्ट करेगा और उसकी पाकिस्तान की मांग को छोड़ने की मददगार हो जाएगा लेकिन जिंदा अहंकार था उसने सोचा कि मुझे बेहद संतुष्ट करने का बुद्धि रच रहे हैं । लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान की मांग को लेकर अड़ा रहा।
@. महात्मा गांधी मोहम्मद अली जिन्ना को पूरी तरह से सत्ता उनके हाथों में देना चाह रहे थे जो भारत में "प्रतिक्रियावादी लोग" में सरकार को देना जिसके चलते भारत में ही कई नेताओं ने स्थिति क आलोचना किया और गांधी की एकतरफा नीति को लेकर गांधी की भी कटु आलोचना की जिसके चलते कांग्रेसी नेताओं और अन्य नेताओं में आंतरिक हलचल और मनमुटाव होने लगा।
@. भारतीय कांग्रेस नेताओं ने गांधी की इस नीति को लेकर अपने आप एक धोखे के रूप में देखने लगा और गांधी की दोहरी नीति का गाथा गाने लगे जिसके चलते महात्मा गांधी ने जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने की प्रस्ताव को वापस ले लिया।
भारत विभाजन में भारतीय नेताओं की सोच:-
@. सरदार वल्लभभाई पटेल ने मुस्लिम लीग को अधिक शांति रहने का अनुरोध किया और कहा स्वतंत्रता के बाद भारत में सांप्रदायिक तत्वों का कोई जगह नहीं होगी इनके कदमों से स्पष्ट है कि मोहम्मद अली जिन्ना और भारत के अन्य प्रतिक्रियावादी लोगों को भारत के प्रति निष्ठा बनाए रखें आपसी भाईचारा के साथ मिलकर भारतीय स्वतंत्र आजादी को सवारते रहेंगे।
@. पी डी टंडन यह उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष थे विभाजन को "जबरदस्ती ठोपने का सुझाव" दिया लेकिन इनकी सोच एक अलग प्रकार की समस्या खड़ा कर सकता था तत्पश्चात में आजादी के बाद समस्या देखने को मिली।
@. कानपुर के कांग्रेसी नेता "राम रतन गुप्ता" कांग्रेस का विभाजन करने को स्वीकार करने की फैसला को धोखा करार दिया और भारतीयों के साथ दूरव्यवहार का आरोप लगाया किसने कहा कि भारत की नेताओं की प्रतिक्रियावादी सोच यह बिल्कुल सही नहीं है भारतीय नागरिक कभी सम्मान पूर्वक और शांति पूर्वक नहीं रह पाएंगे।
@. पंडित जवाहर नेहरू की अलग ही सोच में था इनमें कहां की तलवार और लाठी कभी भी संप्रदायिक ताकतों को जड़ से मिटा नहीं सकती परिणाम स्वरुप विभाजन के पश्चात ही ऐसा ही हुआ। कई भारतीय आम नागरिकों की जान और कई पाकिस्तान लोगों को जाने गई। नेहरू ने व्यक्त किया कि उन चंद लोगों के इच्छाओं के फलस्वरूप भारत से अलग होना चाहते हैं जो एक अच्छी नीति और विचार नहीं हो सकती यह इनकी सोच जिन्ना की ओर संकेत था।
@. जे बी कृपलानी ने कहा कि कोई भी लड़ाई लड़ने से अच्छा होगा कि हम पाकिस्तान को बनने दे भारत विभाजन को स्वीकार करें हम "एकता को जबरदस्ती थोपना" मतलब है संप्रदायिक लड़ाई होगी इसमें कई युद्ध और गृह युद्ध में भारत के आजादी बदल जाएगी इसलिए कृपलानी ने अपनी सोच व्यक्त किया कि पाकिस्तान को बनने ही दिया जाए उसी में भलाई है लेकिन पाकिस्तान और भारतीय नागरिकों ने विभाजन सीमा रेखा पार करते समय सांप्रदायिक तत्व का लक्षण दिखाई दिए और भारी भीषण मारपीट हुआ। विभाजन के फलस्वरूप 10 लाख लोगों की जानें गई।
विभाजन स्वीकार करने के कारण:-
@. ऑल इंडिया रेडियो पर मोहम्मद अली जिन्ना ने सांप्रदायिक विचारों और मुस्लिम लीग के दोहरे बयान को पुनर्जीवित कर दिया जिसके चलते संप्रदायिक दंगे की आशंका बढ़ गई।
@. 3 जून 1947 को भारत विभाजन को स्वीकार कर लिया गया इस विभाजन में जनता की निर्णय शामिल थी।
@. मोहम्मद अली जिन्ना के विचारों और उनकी संप्रदायिक सोच को निपटने के लिए महात्मा गांधी के पास एक ही विकल्प था 4 जून को प्रार्थना सभा में शांति की अपील करना।
@.विभाजन अस्थाई होगी साम्राज्यवादी ताकतें देश में बाहर निकल जाएगी मुस्लिम लीग क पाकिस्तान मांग कि पछतावा होगा।।
@. मुस्लिम हिंदू हमेशा के लिए हिंसा से दूर चले जाएंगे और भारत में एक अलग प्रकार की ही सोच विकसित होगी। महात्मा गांधी के शब्दों में व्यक्त किया गया लेकिन इनकी सोच वर्तमान और उस समय तक भी कोई परिवर्तन देखने नहीं मिला और कहीं अधिक ही बढ़ गई। आज भी जनता संप्रदायिक हो चुकी है और घटनाए बेघर होते ही रहे हैं और हो ही रहे हैं।
@. भारत लोग भारत को एक हिंदू निकाय के रूप में स्वीकार कर लिया था और भारत में स्वर्ण हिंदू की बोलबाला ही होगी यह जिन्ना की सोच भी थी और अन्य भारतीयों को भी ऐसा ही फील हो रहा था।
भारत की आजादी:-
@. 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ जबकि 14 अगस्त 1947 पाकिस्तान को आजादी । निर्वाचन सभा में "भविष्य से साक्षात्कार" नामक का भाषण दिया गया।
@. वंदे मातरम गीत गाया गया और अध्यक्ष का भाषण हुआ अगले ही दिन दुनिया के अनेक देशों से बधाइयां व संदेश पत्र आए।
@. आजादी के समय महात्मा गांधी शामिल नहीं थे वे कोलकाता में अपना पूरा दिन प्रार्थना उपवास और खादी कातते समय बताएं और मंथन और चिंतन में डूबा रहा क्योंकि कोलकाता में सांप्रदायिक दंगे हो चुके थे जो शांत नहीं हो रहे थे गांधीजी के जाने से काफी हद तक शांति आई थी।
@. जेलों से कैदियों को रिहा कर दिया गया ये सभी लोग खुली हवा में आजादी का सांस लिए। लोग अपने तरीके से आज़ादी का जश्न मना रहे थे। वहीं दूसरी तरफ सीमा पार करते हुए भारतीय और पाकिस्तानी लोगों के बीच दंगे भी हो रहे थे।
@. 15 अगस्त 1947 को मातम और उत्सव दोनों को गवाह बना विभाजन के फलस्वरूप 10 लाख लगों को जाने गई करोड़ों लोग अपने मूल निवास स्थान को छोड़ने के लिए मजबूर किए हुए और उनके व्यापार भी चौपट हुए हैं एक प्रकार से आर्थिक तंगी का शिकार हुआ नई जगह पर जाकर उसे नई जिंदगी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
विभाजन होने से आम नागरिकों की ज्यादा समस्या होती हैं उसे नई जगह पर जाने सरकार की नई नीतियां समझने में समय लगती हैं और नासमझ के फल आपसी गृह युद्ध लड़ाइयां मारपीट भीषण युद्ध तब भी होती हैं जो भारत विभाजन का ज्वलंत उदाहरण है। वर्तमान में भारत पाकिस्तान अपने आप में स्वतंत्र राष्ट्र इनकी अपनी विदेश नीति है दोनों देश अलग अलग प्रकार की नीतियां तय करके अपने आप में स्वतंत्र और प्रगति करता है।
आर्टिकल अच्छे लगे तो जरूर शेयर करें दोस्तों तक
पुराने कर पढ़ने के लिए धन्यवाद
Visit you tube channel
👇👇👇
https://www.youtube.com/@shivajeeacademy1328
Thankyou