अभिव्यक्ति की आज़ादी कहां तक उचित ,व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध क्यों ,अधिक आज़ादी देने से क्या खतरा होगा

"अभिव्यक्ति की आजादी  बुनियादी मूल्य है इसे प्रतिबंध करना सत्य नहीं है"

अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ:- 

व्यक्ति को बोलने का अधिकार दिया जाए उसे अपने तरीके से कोई भी नैतिक विचार को व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार करने दिया जाए लेकिन कुछ हद तक उसे "लघुत्तम रूप में प्रतिबंध" भी किया जाए। व्यक्ति को यदि हम बोलने का अधिकार, अपने विचार साझा करने का अधिकार पर प्रतिबंध हम करते हैं तो व्यक्ति की आजादी की कटौती हो जाएगा और वह अपने तरीके से एक प्रबल राष्ट्र का नेतृत्व नहीं कर पाएगा और वह अपने आप में ठगा महसूस करेगा और अपने ही देश के प्रति वह बगावत करेगा और किसी अन्य देश का समर्थन करने लगेगा जहां पर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निश्चित होगी मैं यह नहीं कहता हूं कि सरकार द्वारा पूरी तरह से अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध किया जाए लेकिन कुछ मायनों में प्रतिबंध करना सामाजिक हित में होती है। आप दैनिक जीवन में ऐसे कई घटनाओं से रूबरू होते होंगे अखबार ,मीडिया, नाटक, फिल्म ,धारावाहिक, पत्रिका के प्रकाशित होने पर जिसमें कुछ ऐसे विचार होते हैं जो सामाजिक, राजनीतिक ,धार्मिक आर्थिक रूप से उचित नहीं होता है लेकिन जो व्यक्ति प्रकाशित कर रहे हैं उसमें भी सत्य की भावना है और उसे बाहर आने देनी चाहिए लेकिन इन दैनिक जीवन की घटनाओं को हम प्रतिबंधित कर सकते हैं और नहीं भी किया जा सकता है क्योंकि जो बातें होती है सत्य होती है लेकिन हर बातें सत्य भी नहीं होती है।।

एक व्यक्ति शाही महल में काम करें और नौकरी छोड़ दे तब उनकी अभिव्यक्ति किया:-

एक व्यक्ति अपने जीवन भर इंग्लैंड की शाही महल  में नौकरी किया और दुनिया के अन्य शाही महलों में सेवा देता है और उनकी कार्यों के बातों को तथ्यों के रीति-रिवाजों को वह अपने किताब के माध्यम से प्रकाशित करना चाहता है तो वह उनका सामाजिक रुप से बहिष्कार या उनके द्वारा लिखे जाने वाले ग्रंथ पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है इसमें ऐसा विदित है कि शाही महलों के नियम कानूनों एक निश्चित सूत्र में बंधे होते हैं और उसे किसी भी सदस्य को बाहर की और जानकारी देना उचित नहीं है लेकिन एक व्यक्ति अपने जीवन में उसकी बातें नियमों कानूनों को बाहरी रूप में फैलाना चाहता है लेकिन उसकी बातों को रोक दिया जाता है प्रतिबंध लगा दिया जाता है ऐसी स्थिति में व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर खतरा उत्पन्न हो जाता है। हम यहां पर देख सकते हैं व्यक्ति की अभिव्यक्ति की गरिमा का उल्लंघन है और उसे लघुत्तम रूप से उल्लंघन कहा जा सकता है क्योंकि यह व्यापक प्रतिबंध नहीं है बल्कि उनकी रीति-रिवाजों और नियमों को प्रकाशित करना प्रतिबंध है आप समझ सकते हैं कि आपकी विचार को किस प्रकार से रोका जा सकता है आप सही है लेकिन आप शाही महलों नियमों को प्रकाशित करते हैं तो शाही महल के गरिमा पर ठेस पहुंचेगी जो सत्य भी है और असत्य भी है क्योंकि प्रकाशित करने वाले व्यक्ति की अभिव्यक्ति हनन होती है।

अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रबल समर्थक :-

राजनीतिक चिंतक जे.एस. मिल की कथन है व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रतिबंधित नहीं होनी चाहिए क्योंकि उसकी स्वतंत्रता को प्रतिबंधित कर देंगे तो उसका आमूलचूल परिवर्तन या विकास नहीं हो पाएगा और अपने जीवन में वह प्रगति नहीं कर पाएगा जबकि वहीं पर राजनीतिक विचारक वाल्टेयर का कथन है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर समर्थक हैं मैं कहते हैं - तुम जो कहते हो मैं उसका समर्थन नहीं करता। लेकिन मैं मरते दम तक तुम्हारे कहने के अधिकार का बचाव करूंगा इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता गहराई रूप से प्रतिबंध किया गया है इनकी कथन स्पष्ट है मैं आपकी बातों का समर्थक हूं लेकिन मैं मरते दम तक आपकी आवाज का बचाव करूंगा जो कहीं न कहीं सत्य होती है ।वहीं पर हम बात करें 19वीं शताब्दी में  ब्रिटेन के राजनीतिक विचारक जॉन  स्टुअर्ट की पुस्तक  "ऑन लिबर्टी "प्रकाशित हुई इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विचार किया गया जिसमें कुछ गलत आज के समय में लगते हैं जो सत्य नहीं है इनके द्वारा दिए गए चार नियम इस प्रकार से हैं- पहला - कोई विचार नहीं होता जो गलत लगता है उसको तो  बंद कर देंगे तो इसमें सच्चाई बाहर नहीं निकल पाएगा। दूसरा कारण है कि- सत्य उत्पन्न नहीं होता विचारों के टकराव से पैदा होती है विचार आज प्रतीत होता है वही सही तरह से विचारों को उदय में बहुमूल्य हो सकता है किसी विचार में संघर्ष केवल अतीत में ही मूल्यवान नहीं था हर समय का महत्व के बारे में हमेशा होता है और एक और उक्ति में बदल जाए जब हम इसे विरोध विचार सामने रखते हैं तभी इस विचार का विरोध हो जाता है । अंतिम चार- में कहते हैं जिसे हम समझते हैं वही सत्य है लेकिन यह निश्चित नहीं है कई बार जिन विचारों को किसी समय पूरे समाज में गलत समझा गया और दबाया गया बाद में सत्य पाया गया कुछ समाज ऐसे विचार करते हैं जो आज उनके लिए स्वीकार नहीं है लेकिन विचार आने वाले समय में बहुत मूल्यवान में बदल जाते हैं और दमनकारी समाज संभावनाशील ज्ञान के लाभों से वंचित रह जाते हैं।

अभिव्यक्ति की आजादी पर किया गया कुछ विरोध:-

देवों की भूमि कहे जाने वाले बनारस या कासी भारत की एक भव्य और सांस्कृतिक शहर है इस शहर में विधवाओं की स्थिति पर फिल्म निर्माता दीपा मेहता एक फिल्म बनाना चाहती थी जिसमें विधवाओं को स्थिति और उनकी दुर्दशा को दिखाना चाहती थी ताकि उनकी व्यथा को जान सके लेकिन इस फिल्म का बहिष्कार राजनीतिक के एक हिस्से द्वारा जबरदस्त रूप से विरोध करने लगा कि भारत में विधवाओं की स्थिति को गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाएगा जिसमें विदेशी दर्शकों की जरूरत को पूरा करने के लिए फिल्म बनाया जा रही है जिसके प्राचीन शहर काशी का बदनामी और उनकी गरिमा को धूमिल किया जाएगा इस फिल्म को राजनीतिक व्यक्तियों कुछ धार्मिक संगठनों द्वारा बहिष्कार करने के चलते इसे बनने नहीं दिया गया लेकिन यह फिल्म कहीं और पर जरूर निर्मित हुई इसमें शामिल है कि यदि हम काशी में विधवाओं की स्थिति को उजागर करेंगे दुनिया के सामने हम लाएंगे तो इसमें बनारस की सांस्कृतिक बिगड़ जाएगी और लोग इसे पसंद करेंगे यहां पर व्यक्ति दीपा मेहता की बात करना चाहते हैं और यह बताना चाहते हैं कि सत्य क्या है लेकिन इनकी स्वतंत्रता पर प्रतिबंध सरकार क्यों लगाए राजनीतिक, संगठन क्यों लगाएं क्योंकि जो सत्य है सत्य को छुपाया नहीं जा सकता है बादल सूर्य को कितने दिनों तक ढक रखेगा क्योंकि सत्य बाहर दिखेगा  ऐसे घटनाएं हैं जो प्रतिबंध किया गया है जिसमें ओब्रे मेनन की "रामायण रिटोल्ड", सलमान रुश्दी की "द सेटानिक वर्सेस" समाज कुछ हिस्सों में विरोध प्रदर्शन के चलते प्रतिबंधित कर दिया गया है इसके अलावा अन्य भी "नाथूराम बोलते" नामक नाटक को भी अन समूह द्वारा प्रतिबंधित की मांग करके उसे प्रतिबंध कर दिया गया लेकिन प्रतिबंध लगाना समाज के रूप में काफी दूरगामी परिणाम है यदि हम व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने  लगे तो आदत बन जाएगी जिसमें एक बहुत बड़ा खतरनाक साबित हो सकता है। इसके अलावा हम अपने दैनिक जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व्यक्त करने के विकल्प:-

यदि व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध किया जाता है तो उसे अपने विचार को व्यक्त करने के लिए विकल्प जरूर हो क्योंकि उनके विचार भले आज गलत साबित हो लेकिन आने वाले समय में उनकी विचार सही और प्रबल और एक मार्गदर्शक हो सकता है क्योंकि यदि हम उसको रोक देंगे तो सामाजिक रूप में उसका योगदान धूमिल हो जाएगा। शायद यह विचार उनके द्वारा कहने पर थोड़ी बहुत शोर शराबा हो सकती है लेकिन आने वाला समय में इनकी विचार है अभिलेख बन सकती है। अभिव्यक्ति की विकल्प में हम अखबर ,मीडिया, इंटरनेट मीडिया ,प्रिंट मीडिया ,सोशल मीडिया ,मैगजीन अखबार ,पत्र, मैगजीन  किताब इत्यादि में प्रकाशित कर सकते हैं लेकिन सरकार के संगठनों द्वारा भी इस पर प्रतिबंध देखने को मिलती है सोच और समझ विचार सकते हैं कि व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति की विचार बातें कहां पर साझा करेगा। भारतीय फिल्म जगत में ऐसे कई फिल्में को प्रतिबंधित की मांग की जाती है लेकिन यहां पर मैं स्पष्ट कर दूं कि फिल्मों की रिव्यू यानी सेंसर बोर्ड के माध्यम से की जाती है जो एक केंद्रीय संगठन है लेकिन प्रतिबंध लगाना अलग ही मामला हो जाती है हम किसी विचार को दबा नहीं सकते कि हां काफी हद तक उसे प्रतिबंधित कर सकते हैं लेकिन इनकी विचार से यदि सामाजिक सौहार्द बिगड़ जाते है या असामाजिक कार्य हो सकते हैं तो इस पर प्रतिबंध लगाना उचित होगा। लेकिन व्यक्ति की अभिव्यक्ति कहने की आजादी का दूसरा विकल्प भी देना होगा चाहे सरकारों, राज्य संगठन हो ,धार्मिक संगठन हो, चाहे अन्य वैधानिक संगठन या गैर वैधानिक संगठन क्यों ना हो।



अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहने का खुला मार्ग हो:- 

हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बाहरी प्रतिबंध ना हो लेकिन हमें विकल्प के रास्ते भी छुपी रहे जिसमें हम कार्य कर सकें। बच्चों को माता-पिता की देखभाल में रखा जाना चाहिए सही निर्णय लेने उपलब्ध विकल्पों को विवेकपूर्ण जांचने कार्यों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेने हमारी क्षमता का जितना विकास शिक्षा और निर्णय  से ही निर्माण होगा ताकि समाजिक संगठन ,सरकारी संगठन को अग्रसर करने में मदद होगी यदि माता-पिता अपने बच्चों को सही रूप से शिक्षा व्यवहार विचार और उनकी विकास को पोषण करते हैं तो उसे सही मायने में देश की तरक्की और विकास होगी सरकार या अन्य संगठन भी व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध कुछ सीमित या लघुत्तम रूप से कर सकते हैं लेकिन व्यापक रूप से हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं क्योंकि व्यक्ति आजादी रूप से बातें करना,विचार करना, विचार को साझा करना ,सामाजिक व सांस्कृतिक  कार्यक्रमों में भाग लेकर अपने तरीके से अभिव्यक्त करता है लेकिन यह भी ध्यान रहे आजादी एक सीमा के दायरे  में अच्छी लगती है यदि आप सड़क पर चल रहे हैं तो इनके नियम का पालन करते हुए चलें इसका मतलब यह नहीं है कि आप बीच सड़क में गाड़ी चला रहे हैं तो बाकी की परेशानी होगी ऐसी स्थिति में आपके आजादी को प्रतिबंधित करके दंडित भी किया जा सकता है  सरकार है ही सबसे महत्वपूर्ण पहलू है जो आजादी को प्रतिबंध करती है क्योंकि लोकतांत्रिक देश में सर्वोपरि सरकार हो जाती है सरकार ही जनता चुनती है और अपने तरीके से प्रतिबंध लगाती है लेकिन हम अधिक समय तक प्रतिबंध लगाना भी उचित नहीं है। सरकार यदि प्रतिबंध लगाती हैं अभिव्यक्ति पर तो उसे तुरंत बहाल करने का प्रयास भी करनी चाहिए और व्यक्तियों को अपने विचार साझा करने दु:ख - सुख सुनाने का एक प्लेटफार्म उपलब्ध जरूर कराना चाहिए।


जय हिंद 


आर्टिकल आपको अच्छे लगे तो स विनम्र है उसे दूसरों तक पहुंचा दें ताकि उसकी ज्ञान स्तर भी बढ़ जाए। "ज्ञान प्राप्ति ही मुक्ति का मार्ग है।"


 धन्यवाद




KRISHNA KUMAR

Self employed,IAS preparation and State level services prepration.

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